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276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किन्तु यह स्मरण रखना चाहिए कि व्यावहारिक दृष्टि से गैर-सरकारी और सरकारी सदस्यों से नामांकित सदस्यों और गैर-नामांकित सदस्यों में अंतर था तथा सरकारी सदस्य केवल सतही थे। दोनों ही उस सरकार से अधिदेश प्राप्त करते थे जो विधान-मंडल में उन्हें सीटें दिया करती थीं और सरकार के नामांकित सदस्यों के रूप में वे अपना मत दिया करते थे ताकि सैद्धांतिक रूप से ऐसा न भी हो तो भी व्यावहारिक दृष्टि से प्रांतीय सरकार विधान-मंडलों में इतना अधिक स्थाई बहुमत रखती थी जैसी कि केन्द्रीय सरकार सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से रखती थी। प्रांतीय सरकार की बजट प्रक्रिया ने कार्यपालिका पर विधान-मंडल के अधिक नियंत्रण के मामले में केन्द्रीय सरकार द्वारा अपनाए गए सुधार से अधिक निश्चित नहीं किया। दोनों ही मामलों में लक्ष्य यह था कि विधान-मंडल के सदस्यों को बजट की आवश्यकताओं के संदर्भ में इस प्रकार के परिवर्तन के प्रश्न पर पहले ही बहस का विशेष अधि कार था। प्रांतीय बजट के मामले में इस विशेष अधिकार को साम्राज्यिक बजट की तुलना में पहली ही अवस्था में कार्यान्वित करने की अनुमति थी परन्तु इस तथ्य की दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि प्रांतीय बजट पर विधान-मंडल के प्रस्ताव और साम्राज्यिक बजट पर केन्द्रीय विधान-मंडल के प्रस्ताव अपनी-अपनी कार्यपालिकाओं की केवल सिफारिशें ही थीं। इन दोनों सरकारों की बजट प्रक्रिया में अंतर केवल यही था कि एक कार्यपालिका की अपेक्षा दूसरी कार्यपालिका पर अधिक नियंत्रण नहीं किया गया। यह भी व्यवस्था की गई थी कि प्रांतीय विधान-मंडल को प्रांतीय बजट के अनावश्यक भाग को बनाने के विशेषाधिकार की अनुमति दी गई थी। अतः विधान-मंडल को कार्यपालिका पर अधिक नियंत्रण नहीं दिया गया था। सर्वप्रथम प्रांतीय सरकार अनावश्यक व्यय के वर्ग से आवश्यक व्यय के वर्ग को किसी भी मद में स्थानांतरण द्वारा इस बजट के कार्यक्षेत्र को प्रतिबंधित कर सकती थी। इसके अलावा लोकवित्त के सामान्य सिद्धान्तों पर आधारित बजट प्रक्रिया के कुछ नियमों के कार्यान्वयन से प्रत्यक्ष रूप से समिति की शक्तियों को प्रतिबंधित किया गया ताकि वैकल्पिक अथवा अतिरिक्त व्यय की योजनाओं को प्रस्तुत किया जाए। यह ठीक ही शर्त रखी गई थी कि आवर्ती व्यय में निहित योजनाओं को आवर्ती राजस्व और आवर्ती व्यय की वृद्धि की दर के संबंध में निहित आवर्ती व्यय ही प्रस्तावित किया जा सकता था। इस नियम के कारण समिति को ऐसे प्रस्ताव छोड़ने पड़ते थे जिनमें आवर्ती व्यय निहित होता था परन्तु जो अपने दृष्टिकोण से वांछनीय होते थे। दूसरी ओर इसी प्रकार के प्रस्ताव कार्यपालिका द्वारा तैयार किए गए जिन्हें भारत सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने की मुक्त युक्ति से कार्यपालिका द्वारा सरलता से कार्यान्वित किया गया। इसका परिणाम यह था कि नए नियमों के अधीन प्रस्तुत सभी प्रांतीय बजटों में इस आबंटित निधि की राशि