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परिवर्तन का स्वरूप

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समिति के विवेक पर छोड़ दी गई और इसमें से बजट के कुल व्यय का कुछ ही अंश नगण्य था ताकि प्रांतीय विधानमंडल के अधीन किसी भी वास्तविक मात्रा में प्रांतीय कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाना था।

परन्तु कोई भी वास्तविक उत्तरदायी सरकार भारत में केन्द्रीय सरकार और अलग-अलग प्रांतीय सरकारों के बीच पारस्परिक संबंधों में पूर्ण परिवर्तन किए बिना प्रांतों में प्रारंभ नहीं की जा सकी। इन दोनों के बीच संबंध 1919 के अधिनियम के पारित होने के पूर्व मौजूद था और प्रांतीय सरकारें पूर्ण रूप से केन्द्रीय सरकार के अधीन थीं। ख्1, इस अधीनता के बंधन में हम तीन शृंखलाएं अर्थात् विधायी, वित्तीय और प्रशासकीय शृंखलाएं देख सकते हैं। इन तीनों शृंखलाओं में हमने यह देखा कि वित्तीय शृंखला कितनी कसकर बंधी हुई थी। भारत सरकार का राजस्व और व्यय पर नियंत्रण ऐसे संसदीय कानूनों द्वारा किया गया था जिन्होंने भारत के राजस्वों को एक माना था और कुल मिला कर उन्हें भारत सरकार के प्रयोजनों के लिए लागू किया गया था। यह सत्य है कि इस उपबंध का इतनी कठोरता से अर्थ नहीं निकाला गया ताकि अखिल भारतीय या प्रांतीय विशेष प्रयोजनों की आय के विशेष स्रोतों के विनियोग को बचाया जा सके। अन्यथा वित्त की प्रांतीय पद्धति का विकास असंभव ही होता। परन्तु उसने वास्तव में प्रांतीय सरकारों को उस प्रभाव से वंचित रखा जिनका संबंध उन राजस्वों के आंतरिक वैध अधिकार से था जो उन्होंने एकत्र किए थे। भारत सरकार ने पूर्णतया ब्रिटिश भारत में आरोपित कर निर्धारण पर नियंत्रण किया। इसमें वे स्थानीय कर नहीं थे जिन्हें स्थानीय निकायों ने एकत्र किया था। कानून द्वारा ही कराधान किया जाता था ख्2, परन्तु कानून ने भारत सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना प्रांतीय विधान-मंडल को यह विचार करने से वर्जित कर दिया था किµ

‘‘उस समय लागू कोई भी कानून भारत के लोग ऋण अथवा सीमा-शुल्क

अथवा कोई भी कर या शुल्क को प्रभावित करने वाला और गवर्नर जनरल इन

काउंसिल के प्राधिकार द्वारा भारत सरकार के सामान्य प्रयोजनों पर आरोपित

करने वाला होगा।’’

यह अखिल भारतीय आवश्यकताओं के लिए अखिल भारतीय राजस्व के वैधानिक रहननामे के स्वाभाविक परिणाम हैं। कानून प्रांतीय विधान-मंडल को ऐसे कराधान के नए स्रोत के लिए प्रांतीय प्रयोजनों के उपयोग से प्रतिबंधित नहीं करेगा

  1. भारतीय संवैधानिक सुधारों पर रिपोर्ट, सी.डी. 1909, 1918, अध्याय 5

  2. फिर भी एक स्पष्ट अपवाद है। भारत में भू-राजस्व बिना किसी विधायिका की स्वीकृति के एकत्र किया

गया। विधान-मंडल के अधिकार क्षेत्र से भू-राजस्व के अलग करने से व्यावहारिक रूप से किसी भी

नियंत्रण से शुद्ध लोक राजस्व के 40 और 50 प्रतिशत के बीच का भाग अलग हटा दिया गया।