278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जिसकी खोज के लिए उसमें पटुता है। परन्तु ऐसे मामले में परियोजना को कार्यरूप से परिणत करने से पूर्व भारत सरकार के वित्त विभाग की अनुमति लेनी होगी और यह अनुमति उस समय तक नहीं दी जाएगी जब तक कि निकटता से यह विचार न कर लिया जाए कि क्या इसने केन्द्रीय सरकार के काराधान के स्रोतों का अतिक्रमण किया है। कानून का ऐसा उपबंध है जिसकी यह आवश्यकता थी किःµ
‘‘किसी भी गवर्नर अथवा गवर्नर इन काउंसिल (प्रांत का) को गवर्नर जनरल
ऑफ इंडिया इन काउंसिल की पूर्व अनुमति के बिना नए कार्यालय के खोलने
अथवा कोई वेतन, अनुग्रह राशि अथवा भत्ता देने की शक्ति नहीं होगी।’’
भारत सरकार को प्रांतों के व्यय पर नियंत्रण करने का ऐसा अधिकार दिया गया है जो निदेशों की संहिताओं की शृंखला के तंत्र द्वारा प्रयोग में लाया गया था यथा सिविल सर्विस रेग्युलेशन्स, सिविल एकाउंट कोड़, पब्लिक वर्क्स कोड और इसी प्रकार के अन्य कोड। इन संहिताओं में वित्त तंत्र यथा लेखा परीक्षा और लेखाओं की एकरूपता का रख-रखाव, लोक धन का अभिरक्षण, प्रेषण, अर्थव्यवस्था और इसी प्रकार के अन्य मामले आंशिक रूप से वर्णित हैं परन्तु इन संहिताओं ने प्रांतीय सरकारों की शक्तियों पर निश्चित रूप से अवरोध लगाए, ये अवरोध नई नियुक्तियां करने अथवा पारिश्रमिक बढ़ाने और अन्य मामले यथा भर्ती, पदोन्नति, छुट्टी, विदेश सेवा और पेंशन के संबंध में लगाए गए। इन विषयों पर भारत सरकार द्वारा समय-समय पर दिया गया केस-लॉ की चयनिका भी वस्तुतः उन संहिताओं में शामिल की गई जिनका अनुपालन प्रांतीय सरकारों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि कराधान और व्यय की उनकी शक्तियों पर कठोरता से नियंत्रण किया जाना था तो ऋण लेने की शक्ति भी प्रांतों को कभी नहीं सौंपी गई। यह स्मरण दिलाने वाली बात है कि पोर्टट्रस्ट और नगरपालिकाएं निश्चित सीमाओं में ऋण ले सकती थीं परन्तु चूंकि भारत के राजस्व वैधानिक रूप से अविभाज्य थे तथा भारत सरकार के प्रयोजनों के लिए दिए गए ऋणों के लिए दायित्वपूर्ण थे। प्रांतीय सरकारें ऐसी प्रतिभूति के अलग संसाधन नहीं रखती थीं जिनमें से वे ऋण ले सकें।
प्रांतीय वित्त की प्रस्तावित सीमाओं में प्रांतीय सरकारें केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण से मुक्त नहीं थीं। उसका कारण यह था कि प्रांतीय बंदोबस्त प्रांतीय राजस्वों पर ही आधारित नहीं थे अपितु प्रांतीय आवश्यकताओं पर भी आधारित थे और इन पर केन्द्रीय नियंत्रण अनिवार्य था। भारत सरकार किसी भी प्रांत को दिवालिया होने की अनुमति नहीं दे सकती थी। परन्तु यदि भारत सरकार किसी भी प्रांतीय दिवालियापन