परिवर्तन का स्वरूप
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के लिए उत्तरदायी थी तो वह ऐसी स्थिति में थी कि प्रांतीय व्यय पर नियंत्रण कर सके। जहां तक राजस्व का संबंध है, जब तक उसमें से भारत सरकार ने एक भाग लिया तो भारत सरकार का यह पक्का इरादा था कि प्रांतों के बजट अनुमानों में न केवल हस्तक्षेप किया जाए अपितु प्रशासन के अलग-अलग मामलों में भी हस्तक्षेप किया जाए। उदाहरणार्थ भारत सरकार की भू-राजस्व में रुचि ने अनिवार्य रूप से राजस्व बंदोबस्त की ओर गहन पर्यवेक्षण की ओर उन्मुक्त किया तथा यह नियंत्रण उन मामलों में अधिक कठोर हो गया जहां राजस्व के स्रोत यथा सिंचाई के प्रसार विकास पूंजी लागत पर निर्भर थे।
प्रांतीय सरकारों की विधायी शक्तियां इसी प्रकार कानूनी प्रतिबंधों के अधीन रहीं। जहां तक कानून के स्थाई उपबंधों का संबंध है निस्संदेह ऐसा कोई विस्तृत क्षेत्र नहीं था जहां प्रांतीय विधान-मंडलों की विधायी क्षमता वैध रूप से मुक्त थी। परन्तु वास्तव में स्थानीय विधान-मंडलों की शक्ति दो तरीकों से कम की गई। सर्वप्रथम सभी प्रांतीय विधान-मंडलों के अस्तित्व को कुछ ही वर्ष हुए थे और कुछ प्रांतीय विधान-मंडल बिल्कुल ही नए थे यदि इनकी तुलना गवर्नर जनरल के केन्द्रीय विधान-मंडल की आयु से की जाए तो इस क्षेत्र का एक बड़ा भाग अन्यथा उनके लिए खुला होना चाहिए और उस निकाय के कार्यों से आच्छादित था जिसने देश के लिए अधिकांशतया विधान की सहवर्ती शक्ति सदैव बनाए रखी। परन्तु विधान के मामले में सरकारों के लिए जो क्षेत्र खुला हुआ था वह इस तथ्य से अधिक प्रतिबंधित कर दिया गया कि अखिल भारतीय विधान निर्माण पर नियंत्रण करने के लिए भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) तथा संसद की शक्ति कार्यकारी निर्देशों द्वारा लागू की गई थी जिसने प्रांतीय सरकारों के लिए यह आवश्यक बना दिया था कि वे विधान निर्माण के लिए अपनी सभी परियोजनाओं को प्रारंभ करने से पूर्व भारत सरकार और भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने के लिए प्रस्तुत करें। यह कहना सत्य है कि ये निर्देश निजी सदस्यों के विधेयकों पर लागू नहीं किए गए परन्तु विधान मंडल की अनुमति से विधेयक प्रस्तुत किया जा सकता था तथा प्रांतीय सरकार कई मामलों में ऐसी स्थिति में होती थी कि यदि सफलतापूर्वक ऐसे प्रस्ताव का विरोध करने के लिए विचार करती प्रांतीय सरकारों के निर्देशों द्वारा भारत सरकार ऐसी स्थिति में हो जाती थी कि वह ऐसे निजी प्रांतीय विधान निर्माण पर नियंत्रण कर सकती थी जैसी कि वह प्रांतीय सरकारों के विधेयकों पर प्रभावकारी रूप से अपना नियंत्रण रखती थी।
प्रशासन के वास्तविक कार्य को चलाने के लिए प्रत्येक प्रांतीय सरकार को कानून के अनुसार इस बात की आवश्यकता थी कि वह भारत सरकार के आदेशों का पालन करे और भारत सरकार को उन सभी मामलों में तथा कार्यवाहियों के बारे में