परिवर्तन का स्वरूप
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यह प्रति उत्तरदायी बनाना सैद्धांतिक रूप से असंगत था और व्यावहारिक दृष्टि से दूषित था। यह बात नितांत विचारणीय है कि ऐसे दोहरे शासन में कुछ मामलों में प्रांतीय विधान-मंडल की इच्छाएं भारत सरकार से मेल नहीं खा पाती थीं। ऐसे अवसरों पर प्रांतीय सरकार यह नहीं जानती थी कि वह किसकी आज्ञा का पालन करे। यदि वह विधान-मंडल की इच्छाओं का सम्मान करती थी तो वह भारत सरकार के प्रति अपने कर्तव्य में असफल रह जाती थी। वास्तव में ऐसे संघर्ष का एक मामला रिकार्ड किया गया था। ख्1,
मार्ले-मिंटो सुधारों के समय एक ऐसा अवसर आया जब बंबई की सरकार भारत सरकार से इस बात के प्रयास करने में असफल रही कि शिक्षा विभाग के कर्मचारियों को प्रभावित करने वाले कुछ प्रभार की स्वीकृति दी जाए। ये प्रस्ताव स्थानीय रूप से लोकप्रिय थे तथा एक चुने गए सदस्य ने बम्बई के विधान-मंडल में इन्हें स्वीकार करने के लिए प्रस्ताव रखा। उसके बाद बम्बई सरकार ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जो सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया और एक बार फिर से प्रस्ताव इस आधार पर भारत सरकार को भेजे गए कि इन प्रस्तावों को विधान-मंडल का पूर्ण समर्थन प्राप्त है। परन्तु भारत सरकार और भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट इंडिया) ने यह निर्णय किया कि ये युक्तियां व्यवस्था से परे हैं और यह बतायाःµ
‘‘स्थानीय सरकार का यह कर्तव्य है कि प्रस्तावों को व्यवहार में लाने के लिए
भारत सरकार के निर्णय को अपने पूर्ण प्राधिकार से स्वीकार करे।’’
अर्थात् इस प्रस्ताव का विरोध किया जाना था चाहे इसे सैद्धांतिक रूप से विधान-मंडल की सहमति क्यों न प्राप्त हो गई।
अधीन रखने के बंधन इतने सशक्त थे जिन्होंने प्रांतों को केन्द्रीय सरकार से जकड़ लिया था और जो प्रांतीय स्वशासन के मार्ग में मुख्य अवरोध थे। यदि प्रांतीय सरकार को प्रांतीय विधान-मंडलों के अधीन करना है तो पहला काम यह करना था कि उन शक्तियों को समाप्त कर देना था जो भारत सरकार प्रांतीय वित्त, प्रांतीय विधान-मंडल और प्रांतीय प्रशासन में हस्तक्षेप करने के लिए रखती थी। संवैधानिक सुधारों पर रिपोर्ट के लेखकों ने ठीक ही लिखाःµ
‘‘हमें वर्तमान संरचना को समाप्त करना है। कम से कम नई संरचना का
निर्माण करने से पहले इसके कुछ भाग को तो नष्ट करना ही है। हमारा
काम हस्तांतरण, सीमांकन की रेखाएं खींचने और दीर्घावधि के बंधनों को
संयुक्त रिपोर्ट, पृष्ठ 75-76
संयुक्त रिपोर्ट, पृ. 101