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282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तोड़ने के लिए है। भारत सरकार को प्रदान करना चाहिए और प्रांतों को

प्राप्त करना चाहिए। इसलिए प्रांतों के स्वशासन को चलाने के लिए ऐसा करना

उनका जीवन दान देना होगा।’’

अतः प्रांतीय स्वतंत्रता का मार्ग प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों के बीच कार्यों और वित्त के संतोषजनक विभाजन में निहित था। इन दोनों में से कार्यों का विभाजन तुलनात्मक रूप से सरल था। कार्यों के आवश्यक विभाजन को सुविधाजनक बनाने के लिए भारत सरकार के कुछ सिद्धान्त बनाए जो इस प्रकार हैंःµ

‘‘7 कुछ ऐसे विषय हैं जो इस समय भारत सरकार के सीधे प्रशासन के अंतर्गत

आते हैं। भारत सरकार इनके प्रशासन के लिए अलग कर्मचारियों का वर्ग रखती

है और इसमें प्रांतीय सरकारों का कोई भाग नहीं होता है। इस वर्ग की सरलता

से पहचान कर ली जाती है और अधिकांशतया इसमें कोई संदेह की गुंजाइश

नहीं है कि इसमें किन विषयों को सम्मिलित किया जाएगा। इस विचार के

दूसरे पक्ष में स्थानीय रुचि की अधिकता वाले मामले हैं जिनकी दशाएं प्रांतों में

अलग-अलग होनी चाहिए और सामान्य रूप से कहा जाए तो उन्हें प्रांतीयकरण

के लिए उपयुक्त विषयों के रूप में मान्यता दी जाएगी।

‘‘8 परन्तु इस चरमसीमा के वर्गां के बीच एक बड़ा अनिश्चित क्षेत्र है कि

वर्गीकरण के सिद्धान्तों को निश्चित करने से पूर्व इन वर्गों की और गहन जांच

की आवश्यकता है। इनमें वे सभी मामले समाहित होते हैं जिसमें भारत सरकार

का इस समय विदाई और प्रशासकीय क्षेत्र में अंतिम नियंत्रण है परन्तु भारत

सरकार व्यावहारिक रूप से प्रांतीय सरकारों के साथ विभिन्न अंशों में वास्तविक

प्रशासन में भाग लेती है। कई मामलों में अभ्यासगत प्रतिनिधि का विस्तार पहले

ही काफी बड़ा है। इन पर लगाई गई भारत सरकार की कसौटी है कि क्या

प्रांतीय सरकारों के मामले में ये भारत सरकार के एजेंट हैं अथवा क्या (हस्तक्षेप

करने की शक्तियों के संबंध में निचला कहा जाता है) उन्होंने अपने प्राधिकार

को स्वीकार किया। इस कसौटी को लागू करने में मुख्य निर्धारित कारक पहले

से ही व्यवहार में लाए गए प्रतिनिधान का अंश नहीं होगा परन्तु यह विचार है

कि क्या कुल मिला कर (अथवा एक प्रांत से कही अधिक सभी घटनाओं के

हितों में) भारत के हित अथवा दूसरी ओर प्रांतों का हित वास्तव में प्रभावी होगा।

विचारबिन्दु यह है कि किसी भी एजेंट के लिए प्रतिनिधान पहले से ही विस्तृत हो

सकता है परन्तु उस परिस्थिति में एजेंसी के तथ्य को अस्पष्ट नहीं करना चाहिए

अथवा अपनी ही अंतर्निहित शक्ति में मान्य एजेंट की ओर अग्रसर होना चाहिए।’’

  1. भारत सरकार द्वारा कार्य समिति के लिए ज्ञापन अनुबंध 2, समिति की रिपोर्ट, वर्ष 1919, कमांड 103