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परिवर्तन का स्वरूप

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ये सिद्धांत जिनमें यह कहा गया था कि ‘‘यदि प्रांत्येतर हित विषय पर आधिपत्य रखते हैं तो उन्हें केन्द्रीय समझना चाहिए, ‘‘बल्कि’’ ऐसे सभी विषय जिनमें प्रांतों के हित आवश्यक रूप से आधिपत्य रखते हैं, प्रांतीय होने चाहिए। इसके संबंध में प्रांतीय सरकारों ने अपने ही प्राधिकार को स्वीकार कर लिया है।’’

उन्हें उस कार्य समिति द्वारा स्वीकार लिया गया था जिसने अखिल भारतीय और प्रांतीय विषयों के बीच विभाजन किया था। इस समिति द्वारा की गई सिफारिशें अल्प संसाधनों के साथ इस बात में निहित थीं जिसे 1919 के भारत सरकार के अधि नियम की धारा 45 (क) के अंतर्गत हस्तांतरण नियमावली कहा जाता है जिसने उत्तरदायी सरकार की नीति को प्रभावी बनाया और जो देश के संवैधानिक कानून का एक भाग था ताकि इसके द्वारा प्रांतों के विषय ऐसी सेवाएं बन गए जिन पर प्रांतों ने अपनी ही मान्यताप्राप्त अधिकार को लाभ उठाया जबकि उन्हें 1833 से पूर्व यह लाभ प्राप्त नहीं हुआ था। हस्तांतरण नियमावली के अनुसार घोषणाएं की गइंर् जो इस प्रकार हैंःµ

प्रांतीय विषय

1. स्थानीय स्वशासी शासनःµ इसके अंतर्गत एक प्रांत में स्थानीय स्वशासी शासन के प्रयोजन हेतु स्थापित किए गए नगर निगमों, इम्प्रूवमेंट ट्रस्टों, जिला परिषदों, स्वास्थ्य के माइनिंग बोर्ड तथा अन्य स्थानीय संस्थाओं के गठन और उनकी शक्तियों से संबंधित मामलों, केंटूनमेंट एक्ट, 1910 के अंतर्गत सम्मिलित मामलों को छोड़कर_ जो भारतीय विधान-मंडल द्वारा बनाए गए विधान के अध्यधीन हैं_ निम्नलिखित मामलेःµ

(क) उधार लेने के लिए ऐसे प्राधिकारियों की शक्तियां जो प्रांतीय सरकार की

नहीं हैं, और

(ख) ऐसे प्राधिकारियों द्वारा कर लगाना जो अनुसूचित कर नियमावली की

अनुसूची 2 में सम्मिलित नहीं है।

2. चिकित्सा प्रशासनः µ इसमें चिकित्सालय, औषधालय और पागल खाने तथा चिकित्सा-शिक्षा सम्मिलित हैं।

3. जन स्वास्थ्य और स्वच्छता तथा जन्म-मरण के आंकड़ेःµ भारतीय विधान-मंडल के विधान के अधीन छूत के और संक्रामक रोग जिन्हें भारतीय विधान-मंडल के किसी अधिनियम द्वारा ऐसा घोषित किया जाए।