ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध - Page 31

16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

गणतंत्र सदृश्य हैं और कृषि आय से अपना गुजारा करते हैं और विदेशी संबंधों में लगभग स्वतंत्र होते हैं। एक के बाद दूसरे राजवंशों का पतन और इसी क्रम में राज्य क्रांतियां होती गयीं। हिंदू, पठान, मुगल, मराठा, सिख, अंग्रेज क्रमशः मालिक बने लेकिन ग्रामीण समुदाय वहीं का वहीं रहा और विपत्ति के समय शस्त्र उठाकर अपनी सुरक्षा करता रहा है_ (2 सी.एफ. 1832 कॉमन्स रिव्यू कमेटी, पृ. 29)। गांव के उत्पाद का सरकार को दिये जाने वाले अंश को बताना कठिन है। किसी भी भू-स्वामी की यथार्थ सम्पत्ति के बारे में संबंधित विभागों को बहुत कम जानकारी होती थी। यह गांव की इच्छा या रुचि के बिना सरकार उनकी सम्पत्ति के बारे में जांच और इसकी जानकारी प्राप्त नहीं कर पाती थी। इसलिए अगर भाईचारे से कोई अपने ही हिस्से की मालगुजारी देने में असफल रहता है तो इस मामले का निपटारा स्वतंत्र रूप से ग्रामीणों द्वारा सफलतापूर्वक किया जाता है और वे ही उसका भुगतान करते हैं लेकिन ये सब उनके लिये संरक्षित निजी प्रबंध हैं। मुकदम को सरकार की ओर से इस निर्धारण को लागू करने का कोई अधिकार नहीं है। गांव के प्रत्येक व्यक्ति को कितनी राशि का भुगतान करना है इसका निर्धारण करना उनका अतिरिक्त मामला है। सरकार का हस्तक्षेप इसमें अवांछनीय है। ग्रामवासियों द्वारा की जाने वाली अदायगी का निर्धारण करना उनका पारस्परिक मामला है। जिसका निर्णय ग्राम की सम्पन्नता के आधार पर किया जाता है। उस कर में यह भी देखा जाता है कि अब तक कितनी अदायगी हो चुकी है और कितनी अदायगी अभी करनी है और कितनी की जा सकती है। यह सब गांव की भूमि की स्थिति पर निर्भर करता है। (3 सी.एफ. 1830 एल. 401, 402, 404, 528, 583, 585)।

प्रत्येक गांव की कृषि भूमि के पूरे लेखे जोखे के बारे में सरकार द्वारा सर्वेक्षण कराया गया है। अधिकारियों की उपस्थिति में न केवल विभागीय कर्मचारियों बल्कि संपूर्ण इच्छुक ग्रामीण समुदाय (रैयत) एवं आमंत्रित पड़ोसी ग्रामवासियों की सहायता से खेतों का निरीक्षण कराया गया है। गांव की सीमाएं ठीक से दर्ज की गईं और गांव की भूमि, कृषि उत्पादन, आवासों, फलदार वृक्षों और पुत्रों का ब्यौरा रखा जाता है। (1 सी.एफ. 1831 सी. 3492)।

III . रैयतवारी प्रथा

तीसरी तरह के मालगुजारी निर्धारण को रैयतवारी प्रथा कहते हैं। इसके अनुसार देश की संपूर्ण भूमि पर अधिकतम लगान लगाया जाता है (2 सी.एफ. 1831 सी. 45, 65)। प्रत्येक किसान की कृषि-भूमि पर जो लगान लगाया जाता है वह यथासंभव स्थाई होता है। लगान की यह राशि प्रतिवर्ष कृषि उपज के अनुसार घटती-बढ़ती