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290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(52) केन्द्रीय विषय से संबंधित मामले जिनके संबंध में किसी नियम द्वारा अथवा उसके अंतर्गत स्थानीय सरकार को शक्तियां प्रदत्त की गई हैं।

केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच राजस्व संसाधनों के आबंटन का दूसरा नाम तुलनात्मक दृष्टि से कठिन था। ऐसे मामलों में जिनमें यह प्रस्ताव किया गया था प्रांतों को भारत सरकार से स्वतंत्र बनाने का मुख्य कार्य एक समस्या थी कि उन्हें अपने प्राधिकार को प्राप्त करना चाहिए जो कानून द्वारा स्वीकार किया गया था, संवैधानिक सुधारों की रिपोर्ट के लेखकों के लिए यह कहना स्वाभाविक था किःµ

‘‘हमारा प्रथम उद्देश्य....केन्द्र सरकार के संसाधनों को प्रांतों के संसाधनों से

बिल्कुल ही अलग करने के लिए कुछ साधन जुटाने हैं।’’

इसलिए उस दिशा में पहला कदम ‘‘विभाजित शीर्षों’’ अथवा साझे के राजस्व बजट

का उन्मूलन करना था क्योंकि आम सहमति यह थी कि जहां तक केन्द्रीय सरकार

को प्रांतों के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप करने की छूट थी वहां पर आम सहमति थी

कि यह प्रांतीय स्वतंत्रता के साथ मनमुटाव की स्रोत थी तथा उसके साथ असंगत

थी। परन्तु इस प्रकार के पूर्ण अलगाव की पद्धति को दो मुख्य कठिनाइयों का सामना

करना पड़ा। पहली कठिनाई लाभांश शीर्षों के निपटान के संबंध में हुई। वे किन्हें

सौंपे जाएं? पूर्ण अलगाव की योजना के समय ऐसे राजस्व के शीर्षों के बारे में

विचार किया गया जो समीप्य कुछ प्रांतों में विभाजित किए गए थे और ये शीर्ष

थेःµ भू-राजस्व, स्टाम्प, आबकारी, आयकर और सिंचाई। संवैधानिक सुधारों

की रिपोर्ट के लेखकों ने प्रस्तावित किया ख्1, ःµ (पृष्ठ 293 पर फुटनोट देखें)

‘‘कि स्टाम्प शुल्क से प्राप्त राजस्व पहले ही से पूर्व अंकित उपशीर्ष सामान्य

और न्यायिक के अंतर्गत विभेदकारी था और प्रथम को भारतीय बनाया

जाना चाहिए तथा दूसरे को प्रांतीय प्राप्ति बनाना जाना चाहिए। अंततोगत्वा

यह व्यवस्था वाणिज्यिक स्टाम्प के मामले में आरक्षित की जाएगी जहां यह

स्पष्ट रूप से दरों की विसंगति को दूर करने के लिए वांछनीय है और

इससे प्रांतों को खुली छूट मिल जाएगी कि वे अदालत शुल्क के स्टाम्पों

का लेन-देन कर सकेंगे तथा इस प्रकार उनके संसाधनों को बढ़ाने के लिए

अतिरिक्त साधन उपलब्ध करा सकेंगे। आबकारी इस समय बम्बई, बंगाल

और असम में पूर्णतया प्रांतीय शीर्ष है और अब हमें ऐसा कोई भी वैध

कारण दिखाई नहीं देता कि इसे भारत भर में क्यों न प्रांतीय बना दिया

जाए... भू-राजस्व सबसे बड़ा शीर्ष होता है इस शीर्ष को इस समय भारत

और सभी प्रांतीय सरकारों में बराबर के भागों में विभाजित किया

जाना चाहिए सिवाय इसके कि बर्मा को आधे से अधिक भाग प्राप्त