11 परिवर्तन का स्वरूप - Page 307

292 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जब तक कि वे बने रहे और प्रांतीय सरकार का अनुसरण करने के लिए उन्हें भारत सरकार के साधन के रूप में देखा जाए कि हम आश्वस्त महसूस करते हैं कि उनका उन्मूलन कर देना चाहिए। इसलिए हमारा प्रस्ताव है कि सिंचाई के साथ भू-राजस्व को पूर्णतया प्रांतीय प्राप्तियां बना दिया जाए। उससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रांत दुर्भिक्ष सहायता और रक्षात्मक सिंचाई निर्माण कार्यों पर व्यय के लिए पूर्णतया उत्तरदायी हो जाएंगे....एक शेष शीर्ष आयकर है। हम अधिक शक्तिशाली कारण देखते हैं जो इसे भारतीय प्राप्ति बना सके। सर्वप्रथम देश भर में एक समान दर बनाए रखने की आवश्यकता है। विशेष रूप से वाणिज्यिक विश्व के लिए अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग दरों की असुविधाएं व्यक्त होती हैं। दूसरे किसी बड़े शहर में व्यवसाय केन्द्र के साथ बहुशाखी उद्यमों में ऐसा प्रांत जिसमें कर अदा किया जाता है, आवश्यक रूप से ऐसा प्रांत नहीं हो सकता जिसमें आय ही होती है।

हमें वास्तव में यह बताया गया है कि आयकर भू-राजस्व का केवल औद्योगिक अथवा व्यावसायिक पूरक होता है तथा दूसरे का प्रांतीयकरण किया जाता है जबकि पहले का भारतीयकरण किया जाता है इसका अर्थ यह है कि ऐसे प्रांतों को बम्बई जैसे प्रांत से अधिक प्रारंभिक लाभ दिया जाता है जिनकी सम्पत्ति मुख्यतया अधिक कृषि पर आधारित है जैसी कि संयुक्त प्रांत और मद्रास की कृषि सम्पत्ति होती है और जिसमें अत्यधिक वाणिज्यिक और औद्योगिक हित निहित होते हैं। एक अन्य अधिक व्यावहारिक तथ्य यह है कि प्रांतीय एजेंसी द्वारा कर की वसूली की जाती है और यदि प्रांतीय सरकारों को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाए तो वसूल की गई राशि पर प्राप्तियों के भाग अथवा कमीशन का छद्म रूप से भाग होता है, अतः वसूली में मध्यम गति की प्रकृति होगी और इसके फलस्वरूप प्राप्तियोंं में कमी होगी। हम स्वीकार करते हैं कि इन तर्कों में बल है परन्तु हम इस बात के लिए तैयार नहीं हैं कि उन तर्कों को राजस्व के पूर्ण विभाजन के मार्ग में लाया नहीं जाए। एक प्रांत और दूसरे प्रांत में समानता का व्यवहार कुल मिला कर यथासंभव होना चाहिए। जहां तक कि पूर्णरूपेण बंदोबस्त का प्रश्न है और यह संभव नहीं है कि राजस्व के अलग-अलग शीर्षों की समानता के सिद्धांत का विस्तार हो। यदि यह पता लगे कि प्राप्तियां कम होती जाती हैं तो कर वसूली के लिए अखिल भारतीय एजेंसी बनाना आवश्यक होगा। परन्तु हमें स्पष्ट रूप से इसे विभाजित शीर्ष के रूप में रखने को वरीयता देनी चाहिए। सारांश में हम इस समय भारतीय और प्रांतीय शीर्ष रखना चाहते हैं परन्तु हम प्रथम प्रकार में आयकर और सामान्य स्टाम्प तथा दूसरे प्रकार में भू-राजस्व, सिंचाई, आबकारी और अदालती स्टाम्प रखना चाहते हैं। उसके बाद कोई भी शीर्ष विभाजित नहीं रहेगा।’’