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परिवर्तन का स्वरूप

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अतः प्रस्ताव के अनुसार सभी वर्तमान राजस्व के स्रोतों को केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों में पूर्णतया वितरित करने के बाद भारत सरकार के बजट में घाटा आना आवश्यक था। इस घाटे की पूर्ति कैसे की जाए यह दूसरी कठिनाई थी जिसमें राजस्व के अलग-अलग शीर्षों की पद्धति द्वारा विभाजित शीर्षों की पद्धति को बदलना था। संवैधानिक सुधारों की रिपोर्ट के लेखकों को उस जटिल समस्या के समाधान के लिए उनके सर्वेक्षण की अवधि में कई योजनाएं प्रस्तुत की गईं। इस बारे में उन्होंने कहा ख्1, ःµ

‘‘इसकी पूर्ति के लिए एक मार्ग यह है कि वर्तमान बंदोबस्तों के आधार पर

रख-रखाव किया जाए परन्तु भारत सरकार को विभाजित शीर्षों के अपने भाग के

बजाय बढ़ते हुए राजस्व का कुछ भाग भारत सरकार को आबंटित किया जाए।

परन्तु यह युक्ति उन प्रांतों के बीच सभी वर्तमान असमानताओं को रूढि़बद्ध बना

देगी जो उनमें से कुछ स्थाई बंदोबस्त के कारण विचारणीय हैं, जबकि भारत

सरकार के वित्त में अधिक अनिश्चितता का तत्त्व भी प्रारंभ करेगी। दूसरा यह कि

हमें प्रति व्यक्ति के आधार पर चहुंमुखी अंशदान लेना चाहिए। परन्तु समयोचित

उपाय से भी प्रांतीय संसाधनों और प्रांतीय प्रांतीय आवश्यकताओं की असमानता

के कारण कर निर्धारण की दरों में प्रांतों के बीच अवांछनीय विभिन्नताओं को

मिटाया नहीं जा सकेगा। एक तीसरी योजना यह थी कि सकल प्रांतीय राजस्व

के आधार पर चहुमुखी प्रतिशत को माना जाना था। अन्य बातों के साथ यह भी

विवाद के लिए खुला है कि इससे अनेक प्रांतों में बृहद घाटे हो जाएंगे। चौथे,

उस प्रस्ताव पर विचार किया और उसे रद्द कर दिया कि जिन प्रांतों के पास

अतिरिक्त अंशदान है वे भारी और अव्यावहारिक होने के कारण अन्य प्रांतों की

अस्थाई रूप से सहायता करें।’’

रिपोर्ट के लेखकों द्वारा सिफारिश की गई योजना इस प्रकार थी ख्2, ः

‘‘सकल प्रांतीय राजस्व और सकल प्रांतीय व्यय के बीच अंतर के प्रतिशत के

रूप में भारत सरकार को प्रत्येक प्रांत से अंशदान का निर्धारण।’’

दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि प्रांत के अनुदान सकल राजस्व की अतिरिक्त राशि पर कर निर्धारण जब सभी विभाजित शीर्ष अपने अनुमान सामान्य

  1. रिपोर्ट, पृष्ठ 168

  2. रिपोर्ट, पृष्ठ 169