ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 17
रहती है। इस प्रथा का दूसरा मुख्य सिद्धांत सभी रैयतवारों या खेतिहरों जो अब प्रत्येक गांव में मौजूद हैं के अधिकारों को सुरक्षित रखना है। उनके अधिकारों का उल्लंघन और अतिक्रमण रोकना है (3 सी.एफ. 1831 सी. 5156)। इस तरह रैयतवारी पद्धति में रैयतों को उनके हितों की पूरी जानकारी होती है जो जमींदारी पद्धति में नहीं है। जमींदारी पद्धति में तो प्रस्ताव ही किया जाता है जैसे देश की संपूर्ण भूमि पर लगान का निर्धारण कर दिया जाए लेकिन उस पर कभी कार्यवाही नहीं होती, किंतु लगान का निर्धारण भूमि पर कर दिया जाता है। इस पद्धति से सभी वर्गों के बड़े व छोटे भू-स्वामियों की सम्पत्ति का आदर किया जाता है और जायदाद के प्रत्येक हिस्से की पैमायश की जाती है और लगान का निर्धारण किया जाता है और इस तरह भू-सम्पत्ति के हस्तांतरण में मदद मिलती है। भू-सम्पत्ति का जब बाजार भाव आंका जाता है तो प्रथम प्रश्न यह उठता है कि भूमि की सार्वजनिक मांग के अनुसार उसका मूल्य कितना है (4 सी.एफ. 1831 सी. 4565, 4567, 4568)। रैयतवारी प्रथा प्रत्येक अवस्था या स्थिति में लागू होती है जहां उसके अनुसार भू-स्वामी किसानों के साथ इकरारनामा करते हैं। चाहे भूमि का क्षेत्रफल छोटा है अथवा बड़ा। यह समझौता समान रूप से लागू किया जा सकता है। खेत का यह मालिक सीधे सरकार से समझौता कर उस पर खेती करना आरंभ कर सकता है और वह यह भी जानता है कि एक निश्चित राशि से अधिक की अदायगी भूमि का मूल्य, मिट्टी के किस्म, जनसंख्या, स्थान और अन्य स्थितियों के आधार पर बदलती रहती है। लेकिन यथेष्ट रूप से भूमि की दशा सुधारने पर अधिक लगान भी निर्धारित किया जा सकता है तथापि उत्तम भूमि के लिए लगान की एक अधिकतम सीमा है जिससे लगान बढ़ने पर उसके सभी उत्पाद का लाभ-भू-स्वामी को जाता है। गंभीर विपदा के समय इसमें छूट है (1 सी.एफ. 1832 सी.आर.पी. 20)। जमींदारी पद्धति की तुलना में रैयतवारी प्रथा का दूसरा लाभ यह है कि लोगों को स्वतंत्र रूप से भूमि के मालिकाना अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। वे केवल नाम मात्र के मालिक नहीं होते हैं और इससे बहुत लोगों को लाभ पहुंचा है लेकिन जमींदारी पद्धति में बहुत कम लोगों को लाभ होता है। जबकि रैयतवारी प्रथा में भी कुछ विचारणीय अवस्था तक पूंजी संचय की प्रवृत्ति होती है (2 सी. एफ. 1831 सी. 4577, 4578, 4579)।
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भारत में मालगुजारी प्रथा ऐसी होती थी। जो अब भी विद्यमान है। इस प्रथा का आलोचनात्मक विश्लेषण हम आगे करेंगे।
राजस्व प्राप्ति का दूसरा महत्त्वपूर्ण शीर्ष अफीम राजस्व है। मालगुजारी राजस्व के बाद सर्वाधिक राजस्व अफीम की खेती पर लगने वाले लगान से मिलता है जो दो भिन्न प्रकार से लगाया जाता हैः