परिवर्तन का स्वरूप
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इन सिफारिशों के करने के समय रिपोर्ट के लेखक यह अवलोकन करने के लिए सावधान रहे ख्1, ःµ
‘‘हमें एक चेतावनी देनी है। आपातकाल की परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं जिसका
सामना करने के लिए भारत सरकार द्वारा शीघ्र ही कर लगाने की व्यवस्था नहीं
की जा सकती, और ऐसी दशा में केन्द्रीय सरकार के लिए यह छूट होनी चाहिए
कि वह प्रावधानों का विशेष पूरक कर लगा सके। हमें यह भी कहना चाहिए
कि हमारे प्रस्ताव अधिकांशतया युद्ध के आंकड़ों पर निर्भर हैं, उन्हें इसके बाद
संशोधन के लिए खुला रखना चाहिए_ परन्तु छः वर्ष की अवधि तक परिवर्तन
नहीं करना चाहिए। साथ ही तात्कालिक बहस को बचाने के लिए योजना को इस
बीच प्रांतों के साथ संवैधानिक समझौता के एक भाग के रूप में समझा जाना
चाहिए। यह उस समसामयिक आयोग का कर्तव्य होना चाहिए जिसकी नियुक्ति
के बारे में हमारा प्रस्ताव है ताकि आयोग अपने दस वर्ष के कार्य अनुभव के
बाद संवैधानिक परिवर्तनों के विकास की जांच करे और भारत सरकार को प्रांतीय
अंशदान के प्रश्न की पुनः जांच पड़ताल करे।’’
इन प्रस्तावों को प्रांतीय सरकारों को उनकी राय जानने के लिए भेजा गया। किसी ऐसी योजना की आपत्तियों ने स्वयं ही तत्परता से सुझाव दिए जो कुछ प्रांतों को अन्य प्रांतों की तुलना में केन्द्रीय सरकार की अधिक लागत वहन करने के लिए थी। मदा्रस और संयुक्त प्रांत ने अपने लाभ का क्रमशः 47.4 प्रतिशत तथा 41.1 प्रतिशत भाग भारत सरकार को दिया। जबकि बम्बई और बंगाल ने अपने लाभ का क्रमशः 9.6 प्रतिशत तथा 10.1 प्रतिशत भाग दिया। इस विषय की असमानता इतनी स्पष्ट लगती थी कि जिन प्रांतों के लिए अधिक भार सौंपा गया, उन्होंने अधिक विरोध किया। भारत सरकार इस चीत्कार की संगतता से इतनी अधिक प्रभावित थी कि उसने भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) को पत्र लिखा जिसमें कहा गया ख्2, ःµ
रिपोर्ट, पृष्ठ 170
भारतीय संवैधानिक सुधारों की रिपोर्ट में उठाए गए प्रश्न पर, पृ. 1919 का कमांड 123,
दिनांक 5 मार्च 1919 (पैरा 61)