296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘हमें सिफारिश के प्रारंभिक अंशदानों को अस्थाई रूप से मान्यता देनी चाहिए
और यथासंभव शीघ्रता के साथ ऐसे कदम उठाने चाहिए ताकि अंशदानी के मानक
और समाज स्तर निर्धारित किए जा सकें............इस पूरे प्रश्न को समझदारी के
साथ जांच पड़ताल की आवश्यकता है। इस स्थिति की कठिनाई रिपोर्ट में पहले
ही देखी गई और प्रथम कानूनी आयोग द्वारा जांच पड़ताल के लिए वचन दिया
गया परन्तु हम प्रस्ताव करते हैं कि वित्तीय संबंधों की समिति का गठन किया
जाए, चाहे वह आपके अथवा हमारे द्वारा हो, और जो इस विषय पर पूर्णतया
सलाह दे सके ताकि प्रत्येक राज्य को सही तरीके से मालूम हो सके कि वह
नए शासन के प्रारंभ होने पर किस स्थिति में है।
और अब इस सिफारिश की पुष्टि ख्1, उस संसद की संयुक्त चयन समिति द्वारा की गई जिसने सुधार विधेयक पर विचार किया। तदनुसार भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) ने लार्ड मेस्टन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जो इन बातों पर सलाह देगीःµ
(क) वित्तीय वर्ष 1921-22 के लिए विभिन्न प्रांतों द्वारा केन्द्रीय सरकार को
अंशदान का भुगतान करे,
(ख) इसके बाद प्रांतीय अंशदानों में सुधार किए जाएं ताकि उनका समान वितरण
हो सके जब तक यह अखिल भारतीय घाटा समाप्त न हो,
(ग) प्रांतीय ऋण लेखाओं का भावी वित्त पोषण, और
(घ) क्या बंबई की सरकार आयकर से प्राप्त राजस्व का कोई भाग अपने पास
रखेगी?
लगभग सात सप्ताह की जांच के बाद समिति ने रिपोर्ट प्रस्तुत की। ख्2, उसके विचारार्थ विषय के खंड (क) पर परामर्श देने में उस योजना पर अपना असंतोष व्यक्त किया जो केन्द्रीय राजकोष को अपने अंशदान के रूप में अपने लाभ के निर्धारित समान अनुपात प्रांतों से लेने के लिए संयुक्त रिपोर्ट में दी गई थी। इस योजना के विरुद्ध मुख्य आपत्ति पर जोर दिया गया कि कुछ प्रांतों में कोई लाभ नहीं हुआ था और अपने अनुदानों के अपने-अपने कोटा के भुगतान के बाद अन्य प्रांतों में कोई अतिरिक्त राशि नहीं बची थी। समिति ने यह निर्णय किया और यह निर्णय सही भी था किःµ
- भारत सरकार विधेयक पर संयुक्त चयन समिति की रिपोर्ट (भाग 5, वाक्य खंड 41, पैरा 9, 1919
का हाउस ऑफ कामन्स रिटर्न 203, पृ. 12
- भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया) द्वारा नियुक्त समिति की रिपोर्ट जो भारत में केन्द्रीय और
प्रांतीय सरकारों के बीच वित्तीय संबंधों के प्रश्न पर परामर्श दे सकें, 1919 का कमांड 724, अध्याय 3