परिवर्तन का स्वरूप 297
‘‘किसी भी मामले में कोई अंशदान ऐसा नहीं होना चाहिए जो प्रांत को उस बात
पर बाध्य करे कि वह तदर्थ रूप से नए कर लगाए जो हमारे विचार से प्रचुर
सामान्य संसाधनों के विशुद्ध प्रशासकीय पुनर्व्यवस्था के फलस्वरूप अविचारणीय
होंगे।’’
समिति ने अंशदान के उपलब्ध कराने में सीमित विचार द्वारा अपने को बाध्य महसूस किया जिसके फलस्वरूप उसने यह उत्तरदायित्व महसूस किया कि प्रत्येक प्रांत को न्यायोचित कार्यशील लाभ छोड़ देना चाहिए। ‘‘इसने ऐसे लाभ को वरीयता दी जिसकी यथा संभव प्रांत की सामान्य वित्तीय स्थिति के संबंध तथा उसके संसाधनों पर अधिक सन्निकट दावों में गणना की जा सके।’’
प्रत्येक प्रांत को लाभ का त्याग करने की आवश्यकताओं का पालन करने के और नए कराधान लागू करने की आवश्यकता को बिना नई परिषदों का उद्घाटन करना चाहिए।
समिति ने यह समझा कि सबसे समान योजना यह होगी कि समान अंशदान न लिए जाएं जैसा कि संयुक्त रिपोर्ट में सलाह दी गई थी। ख्1, परन्तु प्रांतों के लाभ के असमान अंशदान लिए जाएं जिनका उन पर दायित्व था।
समिति ने अपनी योजना की निष्पत्ति के बारे में यह विचार व्यक्त किया कि प्रांतीय लाभ की वृद्धि एक आवश्यक कदम था। इसके बाद बिना इसने अपने कार्य को व्यर्थ समझा। प्रांतीय लाभ के बढ़ाने का केवल एक ही उपाय था कि पहले ही से प्रांतीयकृत संसाधन के अलावा साम्राज्यवादी राजस्व के कुछ अन्य संसाधन आबंटित किए जाएं। आयकर के प्रांतीयकरण के लिए एक ऐसे मामले पर विरोध महसूस किया गया जो विचारार्थ के वाक्य खंड (घ) में सम्मिलित किए गए थे। जहां तक बम्बई का संबंध था, समिति संयुक्त रिपोर्ट के तर्कों से प्रभावित हुई। एक विकल्प के
- वित्तीय संबंध समिति की रिपोर्ट में यह तर्क दिया गया है कि अंशदानों के थोपने की योजना और
संयुक्त रिपोर्ट में सुझाई गई योजना के बीच अंतर अंशदानों के आधार पर है, इसका आधार बढ़ती हुई
काम में लाई शक्ति का आधार है। जबकि संयुक्त रिपोर्ट की कुल प्रांतीय अतिरिक्त राशि थी। वित्तीय
संबंध समिति ने विशेष रूप से उस विधि की आलोचना की जो संयुक्त रिपोर्ट में प्रस्तावित की गई थी
ताकि कुल प्रांतीय राजस्व और कुल प्रांतीय व्यय के बीच अंतर की प्रतिशतता के रूप में प्रत्येक प्रांत
से अंशदान का मूल्यांन किया जा सके। उस योजना और केन्द्रीय तथा प्रांतीय सरकारों के बीच राजस्व
के नए वितरण के अधीन प्रांतों की बढ़ती हुई व्यय की शक्ति के अनुसार प्रतिशत लागू करने के लिए
समिति की योजना के बीच अधिक अंतर नहीं दिखाई देता। इस मूल्यांकन के दो अलग-अलग आधार
हैं और इससे सामान्य अभिव्यक्ति विदित होती है (देखिए केन्द्रीय कोष में प्रांतीय अंशदानों के संबंध
में प्रस्ताव पर माननीय राय बहादुर बख्शी सोहन लाल का भाषण, विधान सभा बहस, खंड 3, संख्या
8, पृ. 508) अलबत्ता यह एक भूल है क्योंकि व्यय करने की शक्ति साधारणतया बड़ी अतिरिक्त राशि
का दूसरा नाम है। समिति द्वारा किया गया परिवर्तन समान अंशदान के स्थान पर असमान अंशदान के
प्रस्ताव में था। इसके मूल्यांकन के आधार में कोई परिवर्तन नहीं किया गया।