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परिवर्तन का स्वरूप

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प्रारंभिक अंशदानों का यह अनुपात समिति द्वारा किसी भी विधि से ऐसा नहीं था कि इसे आदर्श मानदंड माना जाए और जिस पर प्रांतों को समान आधार पर अंशदान दिए जाने के लिए कहा जाए। वास्तव में प्रारंभिक अंशदानों के संबंध में सिफारिशें करने के लिए समिति ने अंशदानों की..... पर कम ध्यान दिया और इस बात पर अधिक ध्यान दियाःµ

‘‘कराधान के स्थापित कार्यक्रम तथा विधायी और प्रशासकीय आशाएं और आदतें जो बिना गंभीर शरारत के गत वर्षों से व्यापक रूप से भिन्न (जैसे समान अनुपात को स्वीकार किया जाना चाहिए) अंशदानों के अधिक समान अनुपात में यकायक समायोजित किए गए। तदनुसार यह आवश्यक है कि यदि इस अंशदानों का अनुपात उसके साथ बहुत कम संबंध रखना चाहिए जो आदर्श रूप से समान होगा।’’ परन्तु समिति ने भी यह मान्यता दी कि ‘‘इन प्रकार का आरंभिक अनुपात केवल संक्रमण के रूप में बचाया जा सकता है। यह आवश्यक है परन्तु यह आवश्यक ही है ताकि प्रांतों को समय दिया जा सके कि वे नए वातावरण में अपने बजट का समायोजन कर सकें और हमारा यह स्पष्ट मत है कि अंशदानों की कोई भी योजना संतोषजनक नहीं हो सकती जो न्यायोचित समय में घाटे के भारत को अधिक समान रूप से वितरण करने के लिए कोई प्रावधान नहीं करती है।’’

इसलिए समिति प्रारंभिक अंशदानों से भिन्न मानक अंशदानों के प्रश्न को विचार करने के लिए आगे बढ़ी। ऐसे भार के समान वितरण के लिए आदर्श आधार का होना चाहिए इस बारे में समिति काफी आश्वस्त थी, क्योंकि समिति ने बताया किःµ

‘‘प्रांतों के बीच समता लाने के लिए आवश्यक है कि भारत सरकार का अनुसरण

करने के लिए प्रत्येक प्रांत का कुल अंशदान उसके योगदान की क्षमता के

सानुपातिक होना चाहिए।’’

इस सिद्धांत को कार्यरूप में परिणत करने के लिए दो प्रश्न निहित थे। भारत सरकार का अनुसरण करने के लिए प्रांत का कितना अंशदान होना चाहिए? दूसरे, प्रांत को अंशदान करने के लिए क्षमता का मापदंड क्या है? पहले के बारे में समिति ने लिखा किःµ

‘‘भारत सरकार के कोष में प्रांत का कुल अंशदान भविष्य में घाटे की पूर्ति हेतु

होगा जिनमें उसके प्रत्यक्ष अंशदान निहित होंगे और इसके साथ इसके अप्रत्यक्ष

अंशदान होंगे (जैसा कि वर्तमान में है) और ये सीमा शुल्क, आयकर, नमक

कर आदि के माध्यम से एकत्र किए जाएंगे।’’