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परिवर्तन का स्वरूप

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(19) आपातकाल की स्थिति में किसी भी प्रांत की स्थानीय सरकार से गवर्नर जनरल इन काउंसिल द्वारा यह आवश्यकता हो सकती है कि वह किसी वित्तीय वर्ष में गवर्नर जनरल इन काउंसिल को ऐसे अंशदान का भुगतान करेगी जो पिछले वर्ष से अधिक होगी।

प्रांतीय और केन्द्रीय वित्त को अलग कर यथासंभव पूर्ण बनाने के लिए दो अन्य मामलों का समाधान किया जाना है। दोनों ही पूंजी के लेन-देन के साथ हुड़े हुए थे। एक प्रांतीय ऋण लेखा का प्रश्न था। उस लेखा से उस निधि का प्रतिनिधित्व हुआ जिससे प्रांतीय सरकार ने कृषि ऋण, ऋणी किसानों को ऋण, नगर पालिकाओं और अन्य स्थानीय निकायों आदि को ऋण दिए। यह पूंजी भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई थी जैसी आवश्यकता हुई थी और इसे वापिस किया गया था जैसा कि उसका पुनर्भुगतान किया गया हो। प्रांत ने भारत सरकार को प्रति वर्ष औसत पूंजी पर ब्याज अदा किया। प्रांतीय सरकार ने ऊंची दर पर ब्याज के भुगतान से बचने के लिये अशोध्य ऋण का भुगतान किया। इस बात पर आमतौर से सहमति हुई कि सुधार योजना का यह स्वाभाविक परिव्यय था कि प्रांतों को अपने भावी वित्त के लिए अपने ही ऋण का लेन-देन करना चाहिए और उनके तथा भारत सरकार के बीच में इस प्रकार के स्वाभाविक संयुक्त खानों को यथासंभव शीघ्रता से बंद कर देना चाहिए। यह मामला वित्तीय संबंध समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया और इस दिशा में उसकी सिफारिशों के आधार पर हस्तांतरण नियमावली के नियम 23 द्वारा यह व्यवस्था की गई किःµ

‘‘एक अप्रैल 1921 को गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को देय किसी भी प्रांत

के प्रांतीय ऋण लेखा से लिया गया अग्रिम ऋण भारत के राजस्व से स्थानीय

सरकार को दिया गया ऋण समझा जाएगा और इस पर ब्याज की वही दर लगेगी

जो 31 मार्च, 1921 को लागू थी। ब्याज की राशि ऐसी तारीखों को देय होगी

जिन्हें गवर्नर जनरल इन काउंसिल निर्धारित करें। इसके अलावा स्थानीय सरकार

गवर्नर जनरल इन काउंसिल को प्रति वर्ष ऋण के मूलधन के भुगतान की किश्त

अदा करेगी और यह किश्त इस प्रकार निर्धारित की जाएगी कि गवर्नर जनरल

इन काउंसिल किन्हीं विशेष कारणों से अन्य निर्देश दें तो इस कुल ऋण की

12 वर्ष की अवधि समाप्त होने से पूर्व भुगतान कर दिया जाएगा। यह स्थानीय

सरकार के लिए विकल्प होगा कि वह नियत किश्त से अधिक राशि का किसी

वर्ष भुगतान करे।’’

दूसरा प्रश्न सिंचाई कार्यों पर पूंजी-व्यय के उत्तरदायित्व का था। प्रांतीय ऋण लेखा के मामले के अनुसार इसमें भी यह सहमति की गई कि सिंचाई कार्यों को