परिवर्तन का स्वरूप
307
आबंटित राजस्व की जमानत पर निम्नलिखित प्रयोजनों में किसी प्रयोजन के लिए ऋण ले सकती हैःµ
(क) स्थाई सार्वजनिक उपयोगिता की परियोजना के संबंध में भौतिक प्रकार
की स्थाई परिसम्पत्ति अथवा किसी निर्माण व्यय अथवा अधिग्रहण (उसमें
भूमि का अधिग्रहण, निर्माण कार्यों और उपकरण की देख-रेख सम्मिलित
है)। पर होने वाले खर्चे को पूरा करने के लिए बशर्ते किःµ
(i) प्रस्तावित व्यय इतना अधिक है कि इसे न्यायसंगत रूप से चालू
राजस्व से पूरा नहीं किया जा सकता और
(ii) यदि गवर्नर जनरल इन काउंसिल को ऐसा लगे कि परियोजना से
होने वाली आय उनके आदेश द्वारा समय-समय पर निर्धारित प्रतिशत
से कम है तो ऋण के परिशोधन के लिए रहननामे के प्रबंध किए
जा सकते हैं।
(ख) ऐसे सिंचाई कार्यों पर किसी भी श्रेणी के व्यय को पूरा करने के लिए
जो अधिनियम के पारित होने से पूर्व लागू नियमों के अधीन ऋण की
निधियों से पूरे किये गए हैं।
(ग) दुर्भिक्ष अथवा अभाव के समय सहायता कार्यों को चालू रखने तथा उसके
स्थापना पर होने वाले व्यय को वहन करने के लिए।
(घ) प्रांतीय ऋण लेखा को वित्तपोषित करने के लिए और
(घ) इन नियमों के अनुसार लिए गए ऋणों के भुगतान करने अथवा समाहरण
करने के लिए अथवा गवर्नर जनरल इन काउंसिल द्वारा दिए गए ऋण
का भुगतान करने के लिए।’’
वित्तीय और प्रशासकीय व्यवस्था को समाप्त करने के बाद केवल विधायी तंत्र शेष रहे जिसने अभी तक प्रांतीय स्वायत्तता के विकास को रोके रखा था। यह विधायी तंत्र जैसा कि पहले वर्णित किया गया है उस सिद्धांत के माध्यम से कार्यान्वित किए गए जिनके लिए पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता हुई तथा बाद में भारत सरकार की अनुमति की आवश्यकता हुई। सुधार अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा उन प्रांतों की विधाई शक्तियों के स्वतंत्र अभ्यास के लिए एक क्षेत्र का चयन किया