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परिवर्तन की समालोचना
यह स्पष्ट है कि अच्छा प्रशासन अच्छे वित्त पर निर्भर करता है। क्योंकि वित्त ‘‘समग्र प्रशासकीय तंत्र का ईंधन है।’’ सुधार की योजना का कोई भी पक्ष उन वित्तीय प्रबंधों जिनसे नई प्रशासन व्यवस्था आरंभ होती है, की तुलना में अधिक समीपी और अधिक चिन्तामुक्त अध्ययन की मांग नहीं करता। इस प्रकार की परीक्षा की आवश्यकता इसलिए अधिक होती है क्योंकि सुधार योजना के इस पक्ष की आम जनता या विशेषज्ञ द्वारा तुलनात्मक दृष्टि से बौद्धिक आलोचना बहुत कम हुई है।
विचारणीय पहला प्रश्न यह है कि क्या नए वित्तीय प्रबंधों को प्रशासकीय दृष्टि से व्यावहारिक कहा जा सकता है। प्रशासकीय भद्र लोगों को स्वतंत्र बनाने के लिए उन्हें पूर्णतया अपने ही संसाधनों से वित्तपोषित करना है और इसमें उन्हें एक-दूसरे पर निर्भर रहना है। अतः उन्हें सदैव अधिक महत्त्वपूर्ण संबंध बनाना चाहिए ताकि नया वित्तीय प्रबंध सोचकर किया जाए। यह सत्य हैं कि इस लक्ष्य की प्राप्ति सदैव संभव नहीं है। कुछ मामलों में उनके कार्य करने में यह वस्तुतः सहायक हो सकता है कि भद्र लोग परस्पर आश्रित बनें क्योंकि पारस्परिक निर्भरता के लिए कम से कम सार्वजनिक वित्त के मामलों में निर्बाध सहयोग और शक्ति के लिए विचारणीय आधार प्रस्तुत कर सकता है। फिर भी जहां कहीं भी संभव हो प्रत्येक प्रशासकीय नीति के लिए वित्त में स्वतंत्रता लानी है। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि इस विचार से अंशदानों की पद्धति विभाजित मदों की पद्धति से बेहतर होती है। यह विभाजित मदों की पद्धति की मर्यादा के लिए नहीं है। कई सहवर्ती अथवा अतिव्याप्त कर के कार्यक्षेत्रों की मौजदूगी सदैव कठिनाई का एक स्रोत होती है जब प्रतियोगी कर के कार्य-क्षेत्रों में जो राजस्व के विभिन्न क्षेत्रों को विभाजित किया जाता है ताकि प्रत्येक को पर्याप्त विधियों की अनुमति दी जाए। इसका कारण है कि राजस्व के स्रोतों का विभाजन केवल पर्याप्तता के विचार द्वारा ही शासित नहीं होना चाहिए