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312 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अपितु उपयुक्तता के विचारों द्वारा भी शासित होना चाहिए। यह कराधान की क्षमता की समस्या है जैसाकि प्रो. सेलिगमैन ने कहा है। ख्1,

‘‘समस्या वस्तुतः बहुत महत्त्वपूर्ण है। योजना भले ही कितनी भी सुविचारित क्यों

न हो अथवा न्याय के मूल सिद्धान्तों के समान कितनी ही पूर्णता लिए क्यों न

हो परन्तु यदि कराधान व्यवस्था प्रशासकीय दृष्टि से कार्य नहीं करती है तो यह

योजना से असफल के गर्त में डूब जाएगी।’’

चाहे राजस्व के साधनों में विभाजन किया जाए फिर भी कुछ ऐसे भी हैं जो स्वाभाविक रूप से किसी कराधान के कार्यक्षेत्र द्वारा उपयोगिता के लिए अधिक उपयुक्त है ‘‘परन्तु दूसरा इस बात पर निर्भर करता है कि कर का क्या आधार है? यदि कर का आधार संकीर्ण है तो अधिक संकीर्ण समाधान के कार्यक्षेत्र द्वारा इसके उपयोग के पक्ष में तर्क अधिक सशक्त रहेगा। यदि इसका आधार व्यापक है तो अधिक व्यापक कराधान के कार्यक्षेत्र द्वारा इसकी उपयोगिता के पक्ष में तर्क अधिक संतुलित होगा। परन्तु उपयोगिता के निर्देशों का अनुसरण करने के फलस्वरूप यह सदैव संभव नहीं है कि प्रत्येक प्रशासकीय राज्यतंत्र को अपने प्रयोजनों के लिए पर्याप्त राजस्व प्रदान करने के लिए इसका विभाजन किया जाए। यह हो सकता है कि कोई विशेष कर किसी क्षेत्र के लिए उपयुक्त होता है जबकि उसकी पैदावार उस क्षेत्र के लिए आवश्यक न होने के बजाए किसी ऐसे दूसरे क्षेत्र के लिए आवश्यक हो सकती है जो उस पर रोपित करने के लिए अयोग्य है अथवा दोनों के लिए अंशतः आवश्यक हो सकता है। ऐसी दशा में पर्याप्तता के लक्ष्य किस प्रकार सहायक हो सकते हैं? दो उपचार स्वसयं ही दो सुझाव देते हैं। इनमें से एक का संबंध विभाजित शीर्षों की पद्धति के अपनाने से है और दूसरे का संबंध कई राज्यों के बीच अभाव को समविभाजित करना है और उसे इसको पूरा करने की ओर निश्चित अंशदान करना है। ख्2,

विभाजित शीर्षों की पद्धति किसी भी दशा में भारतीय वित्त पद्धति के लिए विचित्र थी। इसको कई अन्य देशों द्वारा किसी एक रूप या अन्य रूप में स्वीकार किया गया है। उदाहरण के लिए इंग्लैंड में उत्तराधिकार कर को केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है परन्तु आय का एक भाग स्थानीय सरकार को आबंटित किया जाता है। यही बात इंग्लैंड में कुछ अन्य करों के मामले में भी सही है। साम्राज्य के अंतर्गत जर्मनी में कतिपय अप्रत्यक्ष करों की आय संघीय और राज्य सरकारों के

  1. कराधान संबंधी निबंध (आठवां संस्करण 1913) अध्याय 12, राज्य और संघीय वित्तीय संबंध।
  2. इस बात पर ध्यान दिया जाएगा कि यद्वपि नई भारतीय पद्धति विशेषतया अंशदानों की पद्धति है यह

विभाजित मदों की पद्धति के मिश्रण के बिना नहीं है जहां तक आयकर का संबंध है।