314 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के समविभाजन का संबंध है उनमें से एक मदवार प्रबंध है जबकि दूसरा कुल राशि का प्रबंध है इसलिए वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है कि दोनों में से किसी का चयन किया जाए। परन्तु यह मामला किसी अपयश की पद्धति का अलग नाम देने के लिए ही नहीं है ताकि यह आशा की जाए कि इसके अच्छे प्रतिफल होंगे। अंशदानों की पद्धति में विभाजित शीर्षों की पद्धति की तुलना में उच्चता का एक वास्तविक विचार बिन्दु है। यह न केवल निर्धारता की पृथक्कता की ही अनुमति देता है वरन् विभाजित शीर्षों की पद्धति से कहीं अधिक पृथक्कता पैदा करता है। विभाजित शीर्षों की पद्धति के अंतर्गत प्राप्त करने वाले पक्ष का कर निर्धारण में चिंतायुक्त संबंध होता है और राजस्व के विभाजित शीर्षों के प्रशासन में किसी शिथिलता के लिए कर का एकत्र किया जाना उसके हितों को विपरीत रूप से बाध्य करता है_ और इसलिए कर के प्रशासन में भाग लेने का दावा किया जा सकता है परन्तु अंशदानों की पद्धति के अंतर्गत ऐसी संभावना का कोई स्थान नहीं है। इसके भाग को उसी समय आश्वस्त किया जाता है जब वह कर-निर्धारण और एकत्र करने के कार्य से परे हो। इस प्रकार विभाजित शीर्षों की पद्धति के अंतर्गत पृथकता अंशदानों की पद्धति के अंतर्गत होती है।
जब हम नए वित्तीय प्रबंधों की क्षमता का विश्लेषण करते हैं तो हमें यह पता चलता है कि बड़ी आपत्तियां अंशदानों की पद्धति में उठाई जाती हैं परन्तु इनमें से कई आपत्तियां गलत समझी जाती हैं। यह याद रखना चाहिए कि भारत में प्रांतों से केन्द्रीय सरकार को अंशदान उनकी व्यय करने की क्षमता के अनुसार विनियमित किए जाते हैं। दूसरे शब्दों में घाटे से निपटने के लिए व्यय का समविभाजन का यह तरीका पर्याप्तता के लक्ष्यों में सहायक होता है और यह बात स्पष्ट है परन्तु ऐसा क्या है जो इतना स्पष्ट नहीं है, परन्तु यह सब वही है जो अंशदानों की पद्धति का बड़ा गुण है। यह कर-क्षेत्र के प्राप्त करने और देने में अर्थव्यव्यस्था को प्रोन्नत करता है। कर-क्षेत्र के योगदान में यह व्यर्थ का व्यय उसके भार को बढ़ाता है जबकि प्राप्त हुआ कर क्षेत्र के व्यर्थ का व्यय अंशदानों की वृद्धि में प्रत्यक्ष ही प्रतिबिंबित होता है। फिर भी यह विरोध किया जाता है कि अंशदान न्याय-विरुद्ध होते हैं, क्योंकि वे जनसंख्या पर ही आधारित नहीं थे और न ही क्षेत्र अथवा सम्पत्ति अथवा प्रांतों की क्षमता पर आधारित होते हैं। यह भी शिकायत की जाती है कि व्यय करने की शक्तियों के अनुसार अंशदानों की पद्धति विवेकहीन होती है क्योंकि यह अधिक प्रगतिशील प्रांतों में वांछनीय व्यय को निमंत्रित करती है। अलबत्ता बाद के अपने सामान्य स्वरूप में अंशदानों के व्यय के तरीके द्वारा समविभाजन के लिए वास्तविक आपत्ति है। परन्तु दूसरी ओर यह कहा जा सकता है कि यदि क्षेत्र वांछनीय लक्ष्यों के लिए अधिक व्यय के भार उठाने का इच्छुक है तो उस मामूली से अतिरिक्त भार का भय दिखाकर रोक देगा जो अंशदान में वृद्धि का परिणाम होगा। दूसरे, यदि