परिवर्तन की समालोचना 315
यह पाया गया कि अंशदान से ऐसा परिणाम पैदा हुआ तो इस प्रकार के व्यय की छूट देने के सरल औचित्य की स्वीकृति द्वारा इसे अनावश्यक बनाना संभव होगा जो आवश्यक समझे जाते हैं। इन व्ययों को कैसा होना चाहिए यह समायोजन का मामला होगा, जो अलग-अलग होगा। अंशदानों की उगाही के तरीके से व्यय के तरीके द्वारा समविभाजन की पद्धति के गुण अविकल रूप से सुरक्षित किए जाएंगे। और इसके स्वतः लक्षण समान रूप से भलीभांति कार्य करेंगे यदि सभी खर्चों के बजाय कुछ
खर्चों को गणना के आधार के रूप में चुना जाए।
फिर भी इस आपत्ति को अंशदानों की भारतीय पद्धति के विरुद्ध उत्तेजित नहीं किया जा सकता। सबसे पहले, अंशदान परिवर्ती धन-राशि नहीं है जैसा कि अन्य देशों की वित्तीय पद्धतियों के मामले में है। चूंकि प्रांत केन्द्रीय सरकार के घाटे को पूरा करने के लिए अंशदायी होते हैं, इसलिए यह याद रखना चाहिए कि वे केन्द्रीय घाटे को पूरा करने के लिए उत्तरदायी हैं चाहे वर्ष प्रति वर्ष कुछ भी क्यों न हो। दूसरी ओर, साधारण वर्षों में प्रांत 9.83 लाख रुपये के मानक केन्द्रीय घाटे को पूरा करने की दिशा में अंशदान कर सकते हैं। ऐसा मामला होने पर भी अंशदान प्रांतीय बजटों में अनिश्चितता का तत्त्व नहीं बनाते। दूसरे अंशदान केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच वित्तीय प्रबंधों के लिए स्थायी लक्षण नहीं हैं। अंशदानों की उगाही केवल अस्थायी रूप से विचार की जाती है ताकि भारत सरकार अपना वित्तीय उद्धार कर सके और भारत सरकार ने यह वचन दिया है कि वह ऐसी नीति का पालन करेगी जो यथासंभव कम समय में अंशदानों की समाप्ति कर सके। अंत में मानक राजस्व की तुलना में अंशदानों का अनुपात अथवा प्रांतों से किसी प्रांत का व्यय इतना अधिक नहीं है कि वह अपनी वित्तीय पद्धति का भारी दुःस्वप्न देखे तथा परिवर्ती मात्रा न होने के कारण यह नहीं कहा जा सकता कि प्रांतों द्वारा उस उपयोगी व्यय को नियंत्रित करे जो उन्हें खर्च करने का प्रस्ताव करते हैं।
वास्तव में अंशदानों की उगाही को व्यय के समविभाजन तरीके से त्रुटियों के विरुद्ध कुछ भी कहा जाए, यह इन्कार करना कठिन होगा कि यह पद्धति विशेष रूप से समता की आवश्यकताओं का उत्तर देती है। वास्तव में इससे अन्य प्राप्तियों की अपेक्षा भार का अधिक समान ख्1, विरतण होता है। इस बात का न्यायोचित रूप से अनुमान लगाया जाता है कि व्यय जनसंख्या ख्2, अथवा क्षेत्र से कहीं अधिक संबंधित समुदायों की वास्तविक क्षमताओं के लगभग बराबर होते हैं। यह सिद्धांत अपने आप में ही समान नहीं होता परन्तु ऐसी सावधानी बरती गई है कि अलग-अलग प्रांतों
देखिएµसेलिगमैन, सामने के उद्धरण का पृष्ठ 360।
साम्राज्य के अधीन जर्मनी में राज्यों से अंशदान जनसंख्या के आधार पर समविभाजित किए गए। यही
स्थिति स्विटजरलैंड में है।