318 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गया। परन्तु भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) ने अपने डिस्पैच ख्1, में बताया कि ‘‘गत वर्षों के एकत्रित राजस्व शेष से आंशिक रूप में प्रांतीय घाटों को वित्तपोषित करने की प्रक्रिया अब व्यावहारिक रूप से समाप्त हो जाएगी और इस प्रकार शेष राशियां चालू वित्त वर्ष में सामान्यतया समाप्त हो जाएंगी यदि प्रांतों की वित्तीय स्थिरता को भारत सरकार की वित्तीय अंतिम जोखिम के सरल कम नहीं आंका जाए तो जनता अथवा केन्द्र सरकार से सीधे ही ऋण लेकर प्रांतीय घाटों की शृंखला को जारी रखना असंभव हो जाएगा।
इसका क्या समाधान है? अप्रैल, 1922 में शिमला में एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें केन्द्रीय सरकार और प्रांतों के बीच वित्तीय प्रबंधों से संबंधित विभिन्न मामलों पर विचार किया गया। इस सम्मेलन में यह स्पष्ट किया गया कि भारत सरकार और प्रांत स्थायी और परिचित आय पर प्रांतीय वित्त का ठोस पुनर्वास सुनिश्चित करने हेतु समाधान ढूंढ़ने के लिए विभिजित हो जाएं। प्रांतों ने सुधार अधिनियम द्वारा किए गए वित्तीय प्रबंधों के संशोधन द्वारा उनके संसाधनों में वृद्धि का प्रस्ताव रखा। दूसरी ओर, भारत सरकार के प्रवक्ता के रूप में भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) ने इस बात पर जोर दिया कि ‘‘व्यय में कमी करके और राजस्व की वृद्धि की ओर उन्मुख होकर साधनों के अपनाने से संतुलन प्राप्त किया जा सकता है।’’
परन्तु प्रांत अपने उन प्रस्तावों में एक मत नहीं थे जो उन्होंने प्रबंध व्यवस्था में फेरबदल करने के लिए बनाये थे। बम्बई सरकार ने ‘‘विभाजित शीर्षों की पुरानी पद्धति को पूरा लागू करने का प्रस्ताव ख्2, किया जबकि अन्य सरकारें इसके विपरीत रहीं। परन्तु अधिकांश राज्य अंशदानों के उन्मूलन द्वारा सुरक्षित मुक्ति के पक्षधर थे। नए वित्तीय प्रबंधों की ओर प्रांतों की प्रवृत्ति है। वे विभाजित मदों की पद्धति तथा अंशदानों की पद्धति दोनों ही के विरुद्ध हैं। इससे दोनों ओर का लाभ उठाया जाता है और निश्चय ही वे ऐसा प्राप्त कर सकते थे यदि देश के वर्तमान संसाधनों की उचित रूप से देखरेख रखी जाती। वित्त की अपर्याप्तता सदैव राजस्व के संसाधनों की कमी का परिणाम नहीं है। राष्ट्रीय समृद्धि महान और विकसित हो सकती है तथा राष्ट्रीय सम्पत्ति की वृद्धि अबाध गति से आगे बढ़ सकती है। ख्3, यदि ऐसी परिस्थितियों में पर्याप्त राजस्व प्राप्त नहीं किया तो इसका दोष सामाजिक आय में निहित नहीं है। अलबत्ता यह सरकार का दोष है जिसके लिए कहना चाहिए
- देखिए-सेक्रेटरी ऑफ स्टेट वित्त द्वारा ऊपर बताए गए पत्र के उत्तर में डिस्पैच तारीख 9 नवम्बर 1922
का संख्या 17
- सम्मेलन के परिणाम के सारांश के लिए देखिएµ भारत सरकार का पत्र सुपरा पृष्ठ 257
- सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का डिस्पैच, सुपरा पृष्ठ 257