परिवर्तन की समालोचना
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स्टेट फॉर इंडिया) प्रत्यक्ष रूप से इंग्लैंड के मतदाताओं का वशवर्ती है जिनकी मुख्य चिंता यह देखने की है कि उनके बाजार उनके विरुद्ध बंद नहीं किए गए हैं क्या संरक्षणात्मक नीति अच्छी है या बुरीµयह अलग प्रश्न है। इस समय इस बात पर ध्यान दिया जाना पर्याप्त है कि भारत सरकार अपनी वित्तीय शक्तियों पर हानिकारक परिसीमन के अधीन रही है जो राजस्व के स्रोत का उपयोग करने से वंचित करती है जो सर्वत्र वित्तीय संसाधनों में सबसे लचीला और प्रचुर सिद्ध हुआ है। यदि ये परिसीमन न होते तो सभी संभाव्यता में वर्तमान वित्तीय अपर्याप्तता बिल्कुल भी घटित न होती और विभाजित शीर्षों की पद्धति स्वीकार करने अथवा अंशदानों को आरोपित करने के लिए कोई आवश्यकता न होती। देश के कर लगाने के संसाध नों का परिसीमन के कारण स्थिति यह है कि केन्द्रीय सरकार के बजट का घाटा अनिवार्य है। यदि इस तथ्य को मान लिया जाए तो उस घाटे को पूरा करने के किसी तरीके को स्वीकार करना अनिवार्य था और इसमें कोई संदेह नहीं है कि अपनाई गई पद्धति उस पद्धति से अधिक अच्छी है जिसने उसका स्थान लिया है। केन्द्रीय सरकार के वित्त की वर्तमान परिस्थितियों में अंशदानों को तय किए गए मामले के रूप में समझना चाहिए। यह भी नहीं कहा जा सकता कि अंशदानों के उन्मूलन से प्रांतीय वित्त की स्थिरता पुनः प्रतिष्ठित हो जाएगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रांतीय सरकारों का यह विचार प्रचलित है और इस प्रकार का विचार गैर-सरकारी राजनीतिज्ञों के लिए भी है। 14 सितंबर, 1922 को भारतीय विधान सभा में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया और यह उसी विचार पर आधारित था कि यदि भारत सरकार इन अंशदानों को समाप्त करना चाहती थी तो उसे शीघ्र ही प्रांतों की वित्तीय स्थिति को संतुलित करना होगा। इस विश्वास को इस अनुदान द्वारा सशक्त किया गया कि सभी प्रांतों के सकल अनुमानित घाटे ने यह स्पष्ट किया कि वित्तीय वर्ष 1922-23 में 352 लाख रुपये का घाटा था और चूंकि प्रांतों द्वारा साम्राज्यवादी सरकार को कुल अंशदान 983 लाख रुपये का था अतः इस राशि की छूट प्रांतीय बजटों में घाटे को पूरा करेगी। फिर भी यह कहना चाहिए कि 352 लाख रुपये का घाटा प्रांतों की सही स्थिति को नहीं बताता जैसा कि अधिनियम द्वारा किए गए वित्तीय प्रबंधों से प्राप्त किया गया है। यदि हम नए प्रबंध का अनुसरण करके प्रांतों की सही स्थिति जानना चाहते हैं तो हमें लगाए गए नए कराधान पर ध्यान देना चाहिए तथा साम्राज्यवादी खजाने में उसके अंशदान की छूट द्वारा बंगाल के लाभ पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए समायोजन हेतु प्रांतों की स्थिति आगे दी गई है यदि अंशदानों के बिना रहतीःµ