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322 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

1922-23 में प्रांतों की वित्तीय स्थिति

(हजार रुपयों में)

प्रांत राजस्व व्यय लाभ या घाटा मद्रास 15,99,00 17,18,55 -1,19,55 बम्बई 14,32,06 15,42,17 -1,10,11 बंगाल 9,15,86 10,99,90 -1,84,04 संयुक्त प्रांत 13,58,67 13,85,65 -28,98 पंजाब 11,38,26 12,68,44 -1,30,18 बर्मा 10,00,57 11,90,70 -1,90,13 बिहार और उड़ीसा 4,62,65 5,13,80 -51,15 मध्य भारत

(सेंट्रल प्रोविंसेज) 5,35,23 5,72,17 -36,94 असम 2,05,06 2,22,58 -17,52 कुल घाटा - - -8,66,60

इस गणना के अनुसार प्रांतों का कुल घाटा लगभग 867 लाख रुपये होगा। परन्तु हमें इस लेखे में कुछ अन्य समायोजन करने चाहिए। यह संभव नहीं हुआ है कि सेंट्रल प्रोविंसेज के राजस्व से वह राशि घटा दी जाए जो सेंट्रल प्रोविंसेज की उत्पादक शुल्क की वृद्धि से ली गई है। दूसरे वर्ष 1922-23 के लिए सेंट्रल प्रोविंसेज के राजस्व में गत वर्षों के स्थगित राजस्व की वसूली सम्मिलित है। यदि इन समायोजन को प्रांतों का कुल घाटा बनाया गया होता तो इससे ऐसा आंकड़ा निकाला जाएगा जो अंशदानों की छूट द्वारा पूरा किया जाएगा। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि यदि केन्द्रीय सरकार के बजट में इस प्रकार की छूट द्वारा उत्पन्न अतिरिक्त घाटे को वित्तपोषित करने की समस्या की अवहेलना की जाए कि अंशदानों की छूट प्रांतों में वित्तीय अभाव को दूर करने के लिए अपर्याप्त साधन होगा।

किन्तु यदि प्रांतीय वित्त के संबंध में उत्पन्न कठिन स्थिति को अंशदानों की छूट से नहीं सुधारा जा सकता तो हमें इस मामले की जड़ तक पहुंचना चाहिए और यह पूछना चाहिए कि ऐसे क्या कारण हैं जिनसे ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है। क्या प्रांतों के साधारण व्यय के कारण ऐसा हुआ है जो वास्तविकता से कम आंके गए थे? अथवा क्या प्रांतों के साधारण राजस्व के कारण ऐसा हुआ है जो वास्तविकता से अधिक आंके गए थे? इस प्रयोजन के लिए सबसे पहले हमें यह जानना चाहिए कि क्या प्रांतों को आबंटित संसाधन प्रांतों की सामान्य आवश्यकताओं की दृष्टि से