ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध - Page 34

ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 19

सूर्य के वाष्पीकरण से जैसे बंबई और मद्रास में या प्राकृतिक संसाधनों जैसे नमक की खानों से पंजाब में और नमक की झील से राजपूताना में।

बंगाल में कंपनी का नमक पर एकाधिकार था। यह स्वदेशी लोगों द्वारा बनाया जाता था जिन्होंने संपूर्ण नमक को एक निश्चित न्यूनतम मूल्य पर सरकार को देने को ठेका कर रखा था। सरकार तब इस नमक को छः विभिन्न एजेंसियों हिजेली, तामलुक, चिटगांव, हिराकेन, कटक, बालासोर और खोरदाह से उस मूल्य पर बेचती थी जो आयातित नमक पर लगने वाले शुल्क तथा वास्तविक लागत को मिला कर बनता था। इसके परिणामस्वरूप ‘‘इसका औसत उपभोक्ता फुटकर मूल्य’’ एक पैनी प्रति पौंड था।

आयात शुल्क के बराबर उत्पाद शुल्क की पद्धति के अंतर्गत कलकत्ता में निजी तौर पर नमक के उत्पादन की अनुमति थी।

लेकिन 1836 में हाउस ऑफ कॉमन्स की अवर समिति की सिफारिश के आधार पर निश्चित मूल्य पद्धति आरंभ की गई और खुले गोदामों पर पहले की सामयिक बिक्री के बजाए नियमित बिक्री की जाने लगी।

मद्रास में नमक सरकार की ओर से बनाया जाता था और आंतरिक खपत के लिए बेचा जाता था। विदेशी आयातित नमक पर शुल्क के 3 रुपया प्रति पौंड से घटाकर लागत मूल्य और विक्रय मूल्य के अंतर के बराबर कर दिया गया।

बंबई में आयात शुल्क के बराबर उत्पाद शुल्क के आधार पर व्यक्तिगत तौर पर नमक का उत्पादन किया जाता था। पंजाब की नमक की खानें सरकार द्वारा चलाई जाती थीं और नमक उसी स्थान पर बेचा जाता था।

उत्तर-पश्चिम प्रांत में नमक की आपूर्ति बंगाल के निचले प्रांतों, राजपूताना की सांभर झील और पश्चिमी भारत के भागों से जाती थी। इन सभी से उत्तर पश्चिम प्रांतों में ले जाने वाले नमक पर शुल्क इस प्रकार लगाया जाता था ताकि यहां का मूल्य समान हो।

V. चुंगी (सीमा शुल्क)

प्रत्येक नगर और सड़क मार्ग पर असंख्य परिवहन या अंतर्देशीय कर, मार्ग-कर के रूप में लगाए जाते थे। लेकिन इन मार्ग-करों को बंगाल में 1836 के अधिनियम 14 द्वारा, बंबई में 1838 के अधिनियम 1, एवं मद्रास में 1844 के अधिनियम 6 द्वारा समाप्त कर दिया गया और संपूर्ण ब्रिटिश भारत में एक समान सीमा शुल्क पद्धति स्थापित की गई। अंतर्देशीय परिवहन करों के दुष्प्रभावों का बाद में वर्णन किया जाएगा।