20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सीमा-शुल्क राजस्व के दो स्रोत रह गएः
- निर्यात और आयात पर समुद्री सीमा कर, नमक और नील के निर्यात पर
समुद्रीय सीमा-शुल्क लगाया गया।
- स्थल सीमा-शुल्क, मुख्यतया स्वदेशी और ब्रिटिश भारत की सीमाओं के पार
जाने ले जाने वाली वस्तुओं पर लगाया जाता था।
VI. नमक और अफीम पर एकाधिकार जमाने के अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी ने तम्बाकू पर भी एकाधिकार कर लिया जो राजस्व प्राप्ति का एक दूसरा साधन बन गए।
VII. स्प्रिट और शराब की एकाधिकार बिक्री से आबकारी या राजस्व प्राप्त होता था। अधिकतम बोली लगाने वालों को लाइसेंस बेचे जाते थे जिन्हें मनमर्जी के मूल्य पर बेचने का ठेका दिया गया था। कार्य करने के समय और दुकान के स्थान को सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता था।
VIII. ठेलों, बैल-गाडि़यों, बघ्घियों आदि पर पहिया-कर वसूल किया जाता था।
IX. अवर्गीकृत करों को ‘‘सेयर-शुल्क’’ कहा जाता था। देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग प्रकार के कर लगे थे। कभी-कभी स्वदेशी राजस्व अधिकारियों द्वारा अनियमित रूप से की गई वसूली को इसमें शामिल किया जाता था। मद्रास में परिवहन कर और बंगाल में तीर्थयात्रा कर इसमें सम्मिलित थे। दक्षिण में ‘‘यह राजस्व साधन’’ दो मुख्य शीर्षों में विभक्त था, पहला, जिससे दुकानों, व्यापारों आदि पर कर लगा था, ‘‘मोहतुरफा’’ के नाम से पुकारा जाता था और दूसरा बलूता, जो ग्रामीण दस्तकारों द्वारा खेतिहारों से प्राप्त की गई ‘‘फीस’’ पर और उनकी इनामी (किराया मुक्त) भूमि जब वे इसे रखते थे, पर कर के रूप में लगाया जाता था। एक बार, खोटे सिक्कों पर कुछ प्रतिशत कर भी ‘‘सेयर-शुल्क’’ शीर्ष से सम्मिलित किया गया।
X. न्यायिक प्रभार वसूल करने की दृष्टि से विभिन्न मामलों में अलग-अलग मूल्य की टिकट (स्टाम्प) लगाने के रूप में न्यायिक शुल्क वसूल किया जाता था। टिकटों का मूल्य बाद के मूल्य के अनुसार होता था जैसेµ
16 रु. तक के मुकद्मे (वाद) टिकट का मूल्य 1 रु.
16 रु. से 32 रु. तक 2 रु.
32 रु. से 64 रु. तक 4 रु.
64 रु. से 150 रु. तक 8 रु.