332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के लिए सावधानीपूर्वक ध्यान देना चाहिए था कि यह क्या लोगों के लिए अधिक
लाभदायक होगा और इसे अनुरूप लाभ होगा अथवा कुछ या बिल्कुल भी लाभ
नहीं होगा और सभी अंशदान के भार से मुक्त होगा?’’
इस प्रश्न का दार्शनिकों का उत्तर कुछ भी हो सकता है परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत जैसे गरीब देश में जहां कराधान के भार को वहन करने की बहुत कम क्षमता है यदि क्रूर नहीं तो यह सदैव दुःखद है कि इस भार में वृद्धि करने का प्रस्ताव किया जाए। अतिरिक्त कराधान के प्रस्तावों से बचा जाएगा क्योंकि उससे चुनावों में विधायकों के अवसरों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। जब तक विधान-मंडल में सीट प्राप्त करने के लिए नामांकन की साधारण विधि थी तब तक निर्वाचकों के पक्षपात पर ध्यान देना अनावश्यक था। परन्तु जब विधान-मंडल के उम्मीदवार को एक निर्वाचित सीट का जो उपहार है और ऐसे में वह निर्वाचक को कर देने का प्रस्ताव करता है तब ऐसे उम्मीदवार को जीतने के लिए बहुत कम अवसर है चाहे नए करों से सानुपातिक लाभ से कितना ही अधिक लाभ क्यों न मिलता हो। इसके अलावा राजनीतिक पार्टी जिसने भारी कराधान पर आरोप लगा कर नौकरशाही से अपनी शक्ति प्राप्त की है, इसी नीति के अनुसरण द्वारा अपने को अपमानित कराने की सहज सहमति नहीं दे सकती। विधानमंडल की ओर से कराधान की आंतरिक विमुखता आरक्षित और ‘‘अंतरित’’ विषयों की ओर विधान-मंडल की विचित्र प्रवृत्ति द्वारा सशक्त की जाती है। आरक्षित विषय वे हैं जो अधिकांशतया शांति और व्यवस्था से संबंध रखते हैं और अंतरित विषय वे हैं जिनका संबंध अधिकांशतया प्रगति से होता है परन्तु जैसा कि पहले ही बताया गया है कि सुधारों से पूर्व नौकरशाही की नीति प्रगति को व्यवस्थित कराने में बलिदान के लिए बनाई गई थी। अतः यह स्पष्ट है कि संशोधित संविधान के अंतर्गत लोकप्रिय विधान-मंडलों का उद्देश्य यह होना चाहिए कि वे ऐसे विषयों के पक्ष में कार्य करें जिनसे प्रगति होती है। कराधान की वृद्धि की ओर उनकी विमुखता और अंतरित विषयों के लिए उनकी पक्षपात की भावना उनका पक्षपात करेगी ताकि मंत्रियों की ओर से ऐसे प्रस्तावों का स्वागत किया जाए ताकि आरक्षित विषयों के लिए आबंटित राशियों में अधिक कटौती की जाए। मंत्रियों की ओर उनकी प्रवृत्ति अधिकांशतया मितव्ययता की राशि से शासित की जाएगी। वे अंतरित विषयों के लाभ के लिए आरक्षित विषयों में प्रभावकारी होने के योग्य होंगे। इस प्रकार राजस्व की वृद्धि के बड़े आसान न होने के कारण कार्यपालिका के दोनों अर्धभाग, वितरण और प्रकरण शक्ति द्वारा समर्पित गवर्नर इन काउंसिल और लोकप्रिय विधान-मंडल की सामान्य द्वारा समर्पित गवर्नर इन मिनिस्ट्री एक दूसरे पर मितव्ययता के दबाव अपने विषयों के दबाव के मामले में प्रतियोगी होंगे। यदि विधान-मंडल कर लगाने