336 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस तर्क की अकाट्यता में विश्वास करना कठिन है। यह तर्क करना कि अनुभव के बिना कुछ भी नहीं सीखा जा सकता यह बात अनर्गल है। किसी भी व्यक्ति अथवा ग्रुप के लिए उचित व्यवहार देने के लिए आवश्यक है चीजों के अर्थ और मूल्य को समझना। यह अनावश्यक है कि वास्तविक परीक्षा में से गुजरा जाए। उत्तरदायी व्यक्तियों से निर्मित विधान-मंडल पर विश्वास किया जा सकता है कि उन्हें इस बात का ज्ञान हो कि एक मंत्री को अनुभव प्राप्त किए बिना उसे प्रारंभ में ही बर्खास्त करने से क्या परिणाम निकलेंगे?
फिर भी यह तर्क दिया जाता है कि यह पद्धति कम उत्तरदायी नहीं है क्योंकि मंत्रीगण अपने निर्वाचकों के प्रति उत्तरदायी होते हैं, यह बात ओछा पांडित्य प्रदर्शन है। निस्संदेह आस्टिन ख्1, द्वारा इंगलिश संविधान के संबंध में यह तर्क दिया गया कि ‘‘हाउस ऑफ कामन्स उस निकाय के केवल न्यासधारी थे जिसके द्वारा उसका निर्वाचन किया गया और उनकी नियुक्ति की गई।’’ यह कहना सही है कि राजनीतिक भावना में निर्वाचक सबसे महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं, हम यहां तक कह सकते हैं वे वास्तव में प्रभुसत्ता सम्पन्न शक्ति होते हैं क्योंकि उनकी इच्छा प्रत्येक सरकार की प्रतिनिधित्व पद्धति के अधीन होती है और निश्चय ही अंतिम आज्ञाकारिता को प्राप्त कर लेते हैं। परन्तु जैसा कि प्रो. डायसी ने लिखा है ख्2, ःµ
‘‘ऐसी कोई भी अभिव्यक्ति जो कानून निर्माण की प्रक्रिया में संसदीय निर्वाचकों
को श्रेय देती है, वे निर्वाचकों की स्थिति के कानून द्वारा बिल्कुल ही असंगत
होती है। इंगलिश संविधान (और भारतीय संविधान के अधीन भी वही सही है)
के अधीन निर्वाचकों का एकाकी कानूनी अधिकार संसद के सदस्यों का निर्वाचन
करना है। निर्वाचन को संसद के विधान को प्रारंभ करने, स्वीकार करने अथवा
निरस्त करने का कोई वैध साधन प्राप्त नहीं है। कोई भी न्यायपालक एक क्षण
के लिए भी यह दलील नहीं सुनेगा कि ऐसा कानून अमान्य है जो निर्वाचक के
मतानुसार उसका विरोधी है।’’
और यही भारतीय निर्वाचकों की प्रतिष्ठा को सही तौर पर परिभाषित करता है। किसी भी मंत्री को ऐसी अस्तित्व विहीनता के लिए उत्तरदायी ठहराना उसे वास्तव में अनुत्तरदायी बनाना है। इस पर कठिनाई से विश्वास किया जा सकता है कि संविधान के रचियता मंत्रियों की नियुक्ति के इस विशेष तरीके को प्रस्तावित करते समय उन विचारों के प्रति सजग नहीं थे। इससे अधिक संभावना इस बात की है कि मंत्रियों की नियुक्ति का यह विशेष तरीका स्वीकार किया गया क्योंकि इसने उस व्यक्ति
ज्यूरिसप्रुडेन्स, खंड 1, चौथा संस्करण, पृ. 253
सविधान का नियम, आठवां संस्करण, 1915, पृ. 57