परिवर्तन की समालोचना 337
के चयन करने की अनुमति दी जो आरक्षित जनता के प्रभारी लोगों को सहयोग देने के लिए तैयार था और जो विधान-मंडल द्वारा हटाया नहीं जा सकता था। ऐसा व्यक्ति विधान-मंडल की इच्छाओं के अनुकूल काम करने के लिए बहुत कम प्रेरित किया जा सकता था। परन्तु मंत्रीगण विधानमंडल के दंड से बिल्कुल वंचित नहीं किए जा सकते। उस मंत्री की स्थिति जिसने विधान परिषद् के सदस्यों से मित्रता कर ली है और जो बजट के अवसरों पर समझाने में असफल नहीं हो सकते थे और विधान-मंडल के पक्ष में स्वयं को कृपापात्र बनाने में असफल हुआ है की दयनीयता को भली प्रकार समझा जा सकता है। बजट में समाहित मंत्री के प्रस्ताव विधान-मंडल के बहुमत से प्रतिवर्तित हो जाएंगे परन्तु न तो वह और न गवर्नर हस्तक्षेप करेगा। मंत्री के लिए त्यागपत्र देने के अलावा अन्य कोई साधन नहीं रह जाता है।
चाहे कुछ भी हो कहने के लिए इन परिस्थितियों ने असफल होने से द्विशासन को बचाया परन्तु ये परिस्थितियां अस्थाई हैं। राजनीतिक मतभेद अस्थाई होते हैं और सुधार किए गए विधान-मंडल के दूसरे सत्र से सभी मंत्री उसके प्रति उत्तरदायी हो जाएंगे ताकि शक्तियों को अधिक संगठित किया जाए जैसा कि वे हैं जब द्विशासन अवश्य ही असफल हो जाता है।
परस्पर विरोधी विचारों वाली कार्यपालिकाएं विभाजित उत्तरदायित्व, कार्यों का विभाजन और शक्तियों का आरक्षण सरकार की अच्छी पद्धति नहीं बना सकती और जहां सरकार की अच्छी पद्धति नहीं है वहां वित्त की ठोस पद्धति की बहुत कम आशा हो सकती है। इसका प्रारंभिक समाधान यह है कि सामूहिक उत्तरदायित्व के साथ अविभाजित सरकार होनी चाहिए। फिर भी यह केवल उसी दशा में उपलब्ध की जा सकती है जब संपूर्ण सरकार आम स्रोत से अपना अधिदेश प्राप्त करे। इस प्रकार का निष्पादन यथा संभव शीघ्रता से किया जाना चाहिए और इसकी श्रद्धा भाव से इच्छा की जानी चाहिए। इस दिशा में यह जानना प्रोत्साहित करने वाला है कि द्विशासन केवल अस्थाई पद्धति होती है। प्रश्न यह है कि कितनी लंबी और कितनी विस्तृत अवधि अस्थाई अवधि होगी। सरकार के द्विशासकीय रूप के प्रारंभ करने का औचित्य इस अनुमान पर आधारित है कि भारत अपनी पूर्णता में उत्तरदायी सरकार की पद्धति को बनाए रखने के लिए इस समय तैयार नहीं है क्योंकि शैक्षिक और राजनीतिक अनुभव का अभाव है, क्योंकि भारतीय निर्वाचकगण कुछ समय के लिए अपनी आवश्यकताओं को बुद्धिमत्ता अथवा प्रभावकारी ढंग से बनाने के लिए अक्षम हैं और अपने प्रतिनिधियों पर प्रभावी ढंग से अधिदेश आरोपित करने में असमर्थ हैं और शिक्षित वर्गों द्वारा पुराने सामाजिक पक्षपातों के कारण जनता के शोषण का राजनीतिक शक्ति के दुरुपयोग से गंभीर खतरा है। यह कहा गया कि इस आधारभूत तथ्य को उत्तरदायित्व की डिग्री और प्रकार में अंतर करना चाहिए जो प्रारंभ से ही लागू की जा सकती है और इसके फलस्वरूप नई पद्धति उदित होगी और यह