338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आश्वस्त करने के दायित्व को आरोपित करना चाहिए जो अब लोगों को परस्पर मिलाए हुए हैं तथा संतोषजनक स्थानापन्न लोगों को अपना स्थान ग्रहण करने से पूर्व उन्हें पूरी तरह से हटाए हुए नहीं है। दूसरी ओर इस बात पर जोर ख्1, दिया गया है कि इस बात की आवश्यकता नहीं है कि तब तक प्रतीक्षा की जाए जब तक आधारभूत तथ्य लुप्त हो जाता है, क्योंकिµ
‘‘सभी देशों में प्रारंभ में उत्तरदायित्व कुछ ही लोगों को सौंपा गया है और कुछ ही
शिक्षित अल्पसंख्यकों के हाथ में शासन की बागडोर रही है जिन्होंने स्वाभाविक
रूप से शिक्षा के प्रसार के अनिर्णीत होने और इसके फलस्वरूप मतदान करने
के विस्तार तक अशिक्षित जनता के हितों की चिंता की है।’’
अलबत्ता यह तर्क की परिचित रेखा है जिसे भारत में राजनीतिक उग्र सुधारवादियों और सामाजिक अनुदारवादियों (टोरियों) द्वारा पूर्ववत् प्रस्तुत किया गया है। यदि हम उस कठोर, क्रूर और अमानवीय व्यवहार की दुखद कहानी को अलग कर दें जिसे भारत के उच्च वर्गों ने जनता को प्रदान किया है, तो सच्चाई उनकी ओर है_ क्योंकि प्रत्येक देश में ऐसे पददलित समुदाय हैं जो सामाजिक दमन और सामाजिक अन्याय से पीडि़त हैं और फिर भी ऐसा कोई देश नहीं है कि यह सब राजनीतिक शक्ति के बिना ऐसा हुआ हो। परन्तु ऐसे व्यक्ति जो इस तर्क का प्रयोग करते हैं यह भूल जाते हैं कि यदि अन्य देश यथा नीग्रो लोगों के साथ अमरीका तथा हितास के साथ जापान सर्वप्रथम सामाजिक असमानता को दूर किए बिना राजनीतिक सत्ता को अपने हाथ में लिए हुए हैं इसका कारण यह है कि उनके हाथ में सैन्य-शक्ति है। सैन्य-शक्ति तथा नैतिक बल राजनीतिक स्वतंत्रता के दो प्रमुख साधन हैं और जो देश प्रथम प्रकार को उत्पन्न नहीं कर सकता उसे दूसरे प्रकार को उत्पन्न करना चाहिए। इस तरह भारत में यह नितांत सामाजिक समस्या है और इसके समाधान का स्थगन वस्तुतः उस दिन को स्थगित करता है जब भारत किसी अन्य के अधिदेश के बिना अपने ही लोगों के अधिदेश के अधीन स्वतंत्र सरकार बना सकेगा।
- देखिएµ गवर्नमेंट ऑफ इंडिया बिल की संयुक्त चयन समिति के समक्ष माननीय श्री बी.जे. पटेल और
श्री माधवराव का साक्ष्य, हाउस ऑफ कामन्स रिटर्न, 203 सन् 1919, पृष्ठ 106