ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध - Page 42

ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 27

1853 से पूर्व प्रशासन युद्ध संचालन में व्यस्त था अतः यह न केवल लोक निर्माण कार्यों के लिए कोई नई योजना कार्यान्वित कर सका, बल्कि पुरानी योजनाएं भी तेजी से क्षीण होने लगीं।

डॉ. स्प्रे अपनी पुस्तक ‘‘माडर्न इंडिया’’ (1837) में कहते हैं ‘‘केवल स्वतंत्र देशी राजाओं और राजकुमारों के राज्य क्षेत्रों में ही बड़े और लाभदायक निर्माण ही सुरक्षित पाये गये और उनका रखरखाव होता था हमारे राज्य क्षेत्रों में नहरें, पुल, जलाशय, कुंए, कुंज (बाग) जिनका हमारे पूर्वजों के राजकोष से निर्माण संभव हुआ था वे अब बहुत तीव्र गति से नष्ट हो रहे हैं।’’

भारत में लोक निर्माण का वर्णन करते हुए श्री जॉन ब्राइट ने कहाµ‘‘यदि भारत के निवासियों के लिए लोक निर्माण कार्यों के संबंध में कोई बात कहूं तो मैं तथ्यतः यह कह सकता हूं कि पूरे भारत की सड़कों, यात्रा योग्य सड़कों की तुलना में एक अकेले अंग्रेजी देश में कहीं ज्यादा सड़कें हैं, मैं यह भी कहूंगा कि अकेले मानचेस्टर शहर में निवासियों के लिए पानी की आपूर्ति पर ही इतनी अधिक धनराशि व्यय की गई है जो कि ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 14 वर्षोंµ1834 से 1848 में खर्च की गई राशि से अधिक है। यह संपूर्ण कार्य उनके निवासियों के लिए सार्वजनिक रूप में किया गया। मैं कहना चाहूंगा कि भारत सरकार का मुख्य कार्यकलाप विजय प्राप्त करने और विजित क्षेत्रों को अपने राज्य में मिलाने का रहा है।’’

भारत की सभी प्रेसीडेंसियों के लिए लोक निर्माण विभाग में एकरूपता बनाने से पूर्व प्रशासन के इस महत्त्वपूर्ण विभाग को विभिन्न तरीकों से चलाया गया।

बंबई में इसे अधीनस्थ विभाग के रूप में मिलिट्री बोर्ड द्वारा चलाया गयाः सड़कों एवं टैंकों के अधीक्षक को मिलिट्री बोर्ड से बाहर रखा गया।

बंगाल में मिलिट्री बोर्ड का पूर्ण नियंत्रण था। मद्रास में इस विभाग का प्रशासन तिहरा था, जो इस प्रकार थाः

  1. राजस्व बोर्ड का लोक निर्माण विभाग।

  2. सड़क अधीक्षक।

  3. मिलिट्री बोर्ड।

लार्ड डलहौजी ने इस प्रशासन व्यवस्था में एक समानता लाकर परिवर्तन कर दिया जिन्होंने लोक निर्माण कार्यों से संबंधित मामलों के लिए राज्य के अलग विभाग का सृजन किया।

हम ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनाधीन निष्पादित किये गये लोक निर्माण कार्यों की संक्षिप्त रूप में समीक्षा करेंगे।