ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध - Page 44

ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 29

‘‘राजस्व की स्थिति अति तीव्र तथा गहन लागत पर रोक लगाते हुए और जनसंख्या को दृष्टि में रखते हुए यह बहुत महत्त्वहीन नहीं जबकि 837,000 वर्ग मील में फैले ब्रिटिश भारतीय-राजक्षेत्र तथा इसके 132,000,000 प्राणियों की बात आती है। इसमें एक कठिनाई सामने आती है। यह कठिनाई स्पष्ट है जिसका निराकरण किया जा सकता है। ऐसे खर्च के उत्तम परिणाम व्यावहारिक, संक्षिप्त में यह कठिनाई न केवल स्पष्ट है बल्कि इस देश के औपनिवेशिक साम्राज्य की अन्य शाखाओं के इतिहास तथा नीति में भी यह स्पष्ट है। तथा ईस्ट इंडिया कंपनी अथवा अन्य देशों की व्यापारिक कंपनियों के इतिहास ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सामान्य नियम का कोई अपवाद नहीं है कि सावधानीपूर्वक चुनी गई कार्य की मदों पर किया खर्च प्रायः अपव्यय और निरुद़देश्य सिद्ध हो सकता है जबकि इससे स्पष्ट हो जाता है कि यह ऐसा खेत है जिसकी फसल व्यय के निपुण आर्थिक पहलू का प्रमाण है।’’

राजस्व के प्रभाव (दबाव)

अब हम जिस मुद्दे पर विचार करेंगे वह विषय से हटकर है, इसलिए नहीं कि हमारे क्षेत्र से बाहर है बल्कि इसलिए कि हमारे मार्ग में बहुत सी बाधाएं हैं। सर्वप्रथम तो यह है कि हमारे पास जनसंख्या के संबंध में सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। उस समय जनगणना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी तथा जनसंख्या के आंकड़े केवल अनुमान पर ही आधारित होते थे और इतने अस्पष्ट होते थे कि इसका कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं होता था।

ऐसे अध्ययन में दूसरी मुख्य बाधा यह थी कि प्रत्येक वर्ष ईस्ट इंडिया कंपनी की सीमाओं का अनेक मीलों में विस्तार हो जाता था तथा आश्चर्य की बात तो यह थी कि क्या राजस्व में वृद्धि, करों की दरों में वृद्धि के कारण अथवा क्षेत्र विस्तार के कारण होती थी।

तीसरा कारण यह था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के लेखे-जोखे बिल्कुल सही और त्रुटिरहित थे जैसे कि पूर्व में कहा गया है कि सन् 1813 तक के लेखे व्यावसायिक

खातों के साथ मिले थे और बाद में संसद द्वारा इन लेखों को अलग कर दिया गया तब से मुश्किल से ही सुबोध रहे।

परिणामस्वरूप इन गंभीर बाधाओं से हमें अध्ययन के इस महत्त्वपूर्ण पक्ष को त्यागना पड़ा। यदि अलग-अलग विवरणों को एक साथ जोड़ दिया जाए तो इस सबसे हमें राजस्व के प्रभाव पर पहले वाले प्रभाव के बारे में कुछ जानकारी मिलेगी। केवल भूमि कर के बारे में श्री आर.सी. दत्त जो विषय के अद्वितीय विद्वान हैं, कहते हैं ‘‘ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाया गया भूमि कर केवल अधिक ही नहीं बल्कि इसमें जो बुरी बात