ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 31
केवल वर्तमान किराये पर ही नहीं की गई बल्कि प्रमाणित किराये पर बढ़कर 60 प्रतिशत तक की गई।
बंबई व मद्रास में स्थिति कुछ-कुछ सीमा तक पूर्ववत रही। इन दोनों प्रेसीडेंसियों में रैयतवारी व्यवस्था ही विद्यमान रही। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान रैयतवारी प्रथा की भूमि काश्तकारी को श्री फुलर्टन सदस्य मद्रास सरकार ने बहुत अच्छे तरीके से इस प्रकार स्पष्ट किया µ ‘‘कल्पना करें कि सभी भू-स्वामियों अर्थात् ग्रेट ब्रिटेन के सभी प्रमुख किसानों के संपूर्ण भूमि-हित भूमि से समाप्त हो गए। राज्य के प्रत्येक खेत पर निर्धारित कर की कल्पना कीजिए, सामान्यतया इसके भुगतान के तरीकों के अधीन किराये वाली भूमि को जोत तथा मवेशियों की संख्या के अनुसार 40 से 50 एकड़ की सीमा तक प्रत्येक गांव वासी को बांटी गई। कल्पना करें उपरोक्त रूप में निर्धारित राजस्व जो एक लाख राजस्व अधिकारियों की एजेंसी के माध्यम से वसूल किया जाता था, जिसे उनकी इच्छानुसार संकलित अथवा वितरित किया जाता था, यह व्यवसायी के भुगतान के तरीके पर निर्भर करता था कि यह उसके उत्पादन से दिया जाए अथवा अलग संपत्ति से। प्रत्येक व्यक्ति को पड़ौसी पर खुफिया नजर रखने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से तथा उसके भुगतान माध्यम की सूचना देने कि क्या वह अन्ततः स्वयं को अतिरिक्त मांग से बचा सकता है। कल्पना करें गांव के सभी किसानों पर किसी भी समय अलग कर लगाया जा सकता है। ताकि दूसरी बस्ती के एक या अधिक व्यक्तियों की असफलता को पूरा किया जाए। कल्पना करें बोर्ड के आदेशों के अधीन काम कर रहे प्रत्येक प्रदेश के समाहर्ता, श्रम के सभी प्रलोभन को समाप्त करने का स्पष्ट सिद्धांत पर निर्धारण की सामान्य समानता द्वारा, भगोडों को आपस में पकड़ने तथा उन्हें वापस भेजने और अंत में कल्पना करें कि समाहर्ता जो एकमात्र मजिस्ट्रेट अथवा प्रदेश का शांति-दण्डाधिकारी होता है, की सहायता से व्यक्ति द्वारा की गई व्यक्तिगत आपराधिक शिकायत बड़े न्यायालयों में पहुंचायी जा सकती है। कल्पना करें कि इसी प्रकार प्रत्येक अधीनस्थ अधिकारी जो भू-राजस्व एकत्र करने का कार्य करता है और जिसे पुलिस अधिकारी भी कहा जाता है तथा जिसे हिरासत में बंद करने, जुर्माना करने, पद से च्युत करने, दंडित करने, दोषी की शपथ लिए बिना, लिखित में गवाही लेने का अधिकार है।’’
इस संबंध में श्री मार्टिन लिखते हैं, ‘‘यदि मद्रास में रैयतवारी पद्धति का समर्थन करने वालों की यदि किसी तरह आंखें खुल सकती हैं तो उन यातनाओं के रहस्योद्घाटन से ही खुल सकती हैं। स्वर्गीय श्री सुल्लीवन, मद्रास परिषद् के सदस्य ने लेखक को बताया कि जब उन्होंने अपनी कचहरी (ट्रैजरी) से चांदी से भरी गाड़ी को मद्रास के लिए रवाना होते देखा तथा उन लोगों की गरीबी की याद आई जिनसे यह चांदी