ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 37
कंपनी की इंग्लैंड में ऋण प्राप्त करने की क्षमता को संसदीय विनियमों द्वारा कठोरता से प्रतिबंधित किया गया तो हमारा आश्चर्य एकदम विलुप्त हो जाता है। संसद को कंपनी के शासन के लाभ में अधिक रुचि थी न कि उसकी होने वाली हानि में। इसे भारतीय साम्राज्य पर नियंत्रण पाने की बहुत उत्सुकता थी। लेकिन लक्ष्य प्राप्त करने तक यह सदैव समस्यामूलक ही बना रहा तथा परियोजना में देश की अभिरुचि को जोखिम में नहीं डालना चाहते जिसमें सफलता के बावजूद इसके लाभदायक परिणाम भी निहित थे। अतः संसद ने कंपनी के द्वारा एक सीमा से अधिक ऋण प्राप्त करने पर कठोर नियंत्रण लगा दिया ताकि कंपनी भारत पर से अपना आधिपत्य न खो दे जिससे अंग्रेजी पूंजी को खतरे में डालकर इंग्लैंड के लिए तबाही का कारण न बने।
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भारत तथा 1858 का अधिनियम
इस तथ्य के बावजूद कि ईस्ट कंपनी इंग्लैंड की समृद्धि का स्रोत नहीं, इसे ब्रिटिश संसद तथा वहां के लोगों के हाथों बहुत अपमान सहना पड़ा।
ईस्ट इंडिया कंपनी को भारतीय व्यापार के एकाधिकार के प्रति ईर्ष्या थी तथा ब्रिटिश शासन कंपनी को यह विशेषाधिकार सौंप कर इससे अब यथासंभव लाभ प्राप्त करने के लिए कटिबद्ध था। कंपनी के प्रशासन की प्रत्येक कमजोरी धन ऐंठने तथा बाधा उत्पन्न करने का बहाना बन गया था।
भारतीय व्यापार के एकाधिकार से प्राप्त धन को कंपनी से छीनने के लिए चार्टर (राजपत्र) का बार-बार नवीकरण किया जाता था।
कंपनी के इतिहास के आरंभ में ही व्यापार के एकाधिकार के संबंध में विवाद उठ गया तथा इसके पक्ष-विपक्ष में बहुत तीक्ष्णता से वाद-विवाद हुआ। 1833 तक कंपनी ने अपने एकाधिकार को बनाए रखने के लिए अंग्रेजी राजसत्ता पर विजय प्राप्त करने के लिए हर तरीका अपनाया। लेकिन उसी वर्ष एकाधिकार के विरुद्ध प्रचार इतना तीव्र हो गया कि कंपनी तथा मंत्रियों दोनों को हार माननी पड़ी तथा संपूर्ण इंग्लिश जनता के लिए ईस्ट इंडिया व्यापार खोल दिया गया।
1834 के अधिनियम के द्वारा कंपनी वाणिज्यिक निगम नहीं रही। कंपनी के दायित्व किस प्रकार पूरे किये गये इसका विवरण इस प्रकार हैµ
‘‘1834 के अधिनियम के अधीन बेची गई वास्तविक व्यावसायिक सम्पत्ति से 15,223,480 पौंड प्राप्त हुए जिसका निपटान इस प्रकार किया गयाः 8,191,366 पौंड भारतीय ऋण की अदायगी के रूप में, 2,218,831 पौंड इंग्लैंड में राजक्षेत्रीय प्रभार