ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध - Page 53

38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के रूप में अदा किये गये, 1,788,525 पौंड गृह ऋण की अदायगी के रूप में दिये गये। 1874 में कंपनी के पूंजी स्टाक 6,000,000 के अंतिम शोधन हेतु चक्रवृद्धि ब्याज पर ‘‘प्रतिभूति बॉण्ड उपलब्ध कराने हेतु 2,000,000 पौंड बैंक ऑफ इंग्लैंड को निधियों के निवेश हेतु जमा कराये गए, जहाज मालिकों तथा अन्य व्यक्तियों पर क्षतिपूर्ति के रूप में 561,600 पौंड खर्च किए गये, तथा भारत सरकार के लिए उपलब्ध बकाया रोकड़ के उद्देश्य से बाकी 463,135 पौंड इंग्लैंड में रख लिये गये। कंपनी द्वारा घोषित व्यावसायिक अनुपलब्ध परिसम्पत्तियों जैसे इंडिया हाउस, लीडन हाल स्ट्रीट, मिलिट्री भंडार विभाग के लिए प्रतिधारित एक भंडार, भारत में भवन सम्पत्ति जिसका कुल मूल्य 635,445 पौंड था कंपनी के कब्जे में रहा लेकिन इसका उपयोग भारत सरकार द्वारा किया गया था।

यद्यपि कंपनी व्यापार निकाय नहीं रही लेकिन उसने भारत में अपने राजक्षेत्रों की राजनैतिक प्रभुसत्ता के अस्तित्व को बराबर बनाए रखा। दुर्भाग्य से कंपनी तेजी से अपना अस्तित्व खो रही थी।

यह मानना भूल होगा कि 1857 के गदर में परिलक्षित अकुशलता के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी समाप्त कर दी गई। इसके विपरीत वास्तव में गदर की घटना के पूर्व सम्राट द्वारा भारत सरकार का कार्यभार ग्रहण करने के बारे में बातचीत चलती रही थी जो इस तथ्य की प्रतीक है कि गदर के कारण अन्यथा ब्रिटिश राजनेता जो कुछ भी उपलब्ध था उस पर सीधा नियंत्रण रखने के लिए आतुर थे, लेकिन भारत में एक निगम की स्थापना कर जो उनका अच्छी तरह से भरण पोषण करे उसके माध्यम से परोक्ष रूप से भारत में शासन करना चाहते थे। कुल मिलाकर यह प्रक्रिया बहुत श्रम साध्य थी। 1857 में क्रीमियन युद्ध में अपनी सफलता के परिणामस्वरूप लार्ड पामर्स्टन भारी बहुमत से सत्ता में आए और उन्होंने तुरंत कंपनी के निदेशकों को कंपनी की समाप्ति के लिए एक विधेयक लाने तथा सम्राट द्वारा सीधे भारत सरकार की पूर्ण अवधारणा के प्रस्ताव की अधिसूचना से आश्चर्यचकित कर दिया।

दुर्भाग्य से 1857 में गदर हुआ जिसने जोरों पर चल रहे समापन आंदोलन में और अधिक तेजी ला दी।

31 दिसम्बर 1857 को कंपनी के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष ने पामर्स्टन की अधिसूचना का यह जवाब दिया कि ‘‘कंपनी के समान भारतीय प्रशासन को चलाने के लिए एक मध्यवर्ती, गैर-राजनैतिक तथा स्वतंत्र निकाय की आवश्यकता है।’’

इसके अतिरिक्त कंपनी ने संसद के दोनों सदनों को औपचारिक याचिका भेजी। जान स्टुआर्ट मिल ने याचिका का मसौदा बनाते हुए कंपनी के समापन हेतु विधेयक को प्रस्तुत करने वाले प्रस्तावक के दोष दर्शाए। सम्राट ने तर्कों में प्रारंभ से ही नियंत्रण