ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 39
बोर्ड के प्रभारी मंत्री के माध्यम से भारत सरकार पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। भारत सरकार तथा सम्राट के मंत्री के मध्य एक निदेशकों का कोर्ट था जो नये विधेयक को विकसित करना चाहता था। मिल ने अपना तर्क दिया कि निदेशकों का कोर्ट (ईस्ट इंडिया कंपनी का एक अंग), अनुभव का मूर्त रूप भारत के प्रशासन पर वास्तविक नियंत्रण करने वाले सम्राट के मंत्री का एक अच्छा मार्गदर्शक था और यह भी कहा कि प्रशासन व्यवस्था में यदि कोई खामी आ गई है इसके निराकरण के रूप में जो उपाय सोचे गये हैं अर्थात् निदेशकों के कोर्ट को समाप्त करना तथा सम्राट के मंत्री को निरंकुश शासक बनाना कहीं अधिक भयावह है।
‘‘यह विश्वास करना कि निदेशकों की कोर्ट की सहायता के बिना यदि सम्राट का मंत्री भारत का प्रशासन चलाएगा तो वह त्रुटि रहित होगा तो यह मानना होगा कि मंत्री अपनी इच्छा के अनुसार पूरी शक्ति से भारत का प्रशासन चलाएगा क्योंकि उसे अनुभवी और उत्तरदायी परामर्शदाताओं की सहायता प्राप्त है।
भारत के इंग्लैंड से भावी संबंधों के बारे में मत वैभिन्न्य उत्पन्न हो गए।
इंग्लैंड के महत्त्वपूर्ण समाचार-पत्र ‘स्टेनले रिव्यू’ ने तर्क दिया कि भारत को अंग्रेजी राजनीति से दूर रखने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी बरकरार रखी जाए। इससे यह तथ्य स्पष्ट हो गया कि जो अंग्रेज भारत में आए वे निरंकुश हो गए। जिससे प्रजातंत्र को खतरा उत्पन्न हो गया। इसने स्पष्ट रूप से यह घोषणा की कि ‘‘एक विशाल टारपीडो की तरह भारत इंग्लैंड के लाभदायक क्रियाकलापों को नष्ट कर देगा। तथा इंग्लैंड का स्वतंत्र नैतिक जीवन शक्तिहीन हो जाएगा।’’ ...और यदि इंग्लैंड के पूर्ण नियंत्रण में लाया गया तो यह विचारधारा के रूप में कार्य करेगा जिससे उसे नेपल्स के राजा के सिद्धांतों तथा मैडम स्टोव लैग्री की प्रक्रिया के बारे में जानकारी प्राप्त होगी।’’
कोंटे के शिष्य रिचर्ड कांग्रीव जैसे अन्य लोगों ने कहा कि भारत को स्वयं अपने भाग्य का निर्णय करने के लिए छोड़ देना चाहिए। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति का दूसरे पर शासन करना नैतिक पतन करना है तथा मानवता के बेहतर विकास के लिए भी उपयुक्त नहीं है। अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ देने के पश्चात् वहां किसी दूसरे देश को पदार्पण न करने देने के लिए उसने यह प्रस्तावित किया कि भारत को उत्तराधि कार के रूप में सौंपे गए प्रशासन को नियमित करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय बोर्ड का गठन किया जाए जिसका उद्देश्य भारतीयों को अपनी स्वतंत्र सरकार बनाने में सक्षम करना होगा।
लेकिन ब्रिटिश सांसदों को इनमें से कोई भी विचार रुचिकर नहीं लगा क्योंकि उन्होंने अलग ही निर्णय किया था। वे ईस्ट कंपनी को समाप्त करने का इरादा कर