ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 41
पर लाभांश केवल भारत के राजस्व से ही पारित किया जाना चाहिए।’’
भारत तथा इंग्लैंड के बीच समानता के आधार पर तय किये जाने वाले मामलों में केवल भारतीय ऋण का मामला ही महत्त्वपूर्ण था। इस समय केवल एक ही ज्वलंत प्रश्न था कि भारतीय ऋण का भार कौन वहन करेगा।
‘‘प्रश्न यह था कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है तथा इसका उद्देश्य क्या था?’’ तथा भारत के उत्तरदायित्वों से हम संभवतया किस प्रकार उऋण हो सकते हैं।
इस समस्या पर अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी मेजर विनगेट ने गदर के तुरंत बाद की थीः
‘‘क्या भारत के लोगों को अपने मामलों का स्वयं प्रबंध करने का अधिकार था और क्या इस देश की सरकार के हस्तक्षेप किए बिना केवल भारत के कल्याण की दृष्टि से भारत सरकार के कराधान तथा व्यय को विनियमित किया गया है? भारत सरकार प्रारंभ से अब तक अपनी शक्तियों अथवा स्वरूप के संदर्भ में ब्रिटिश सरकार की रचना रही है। ऋण प्राप्त करने हेतु अनुबंध करने के लिए भारत सरकार में निहित शक्तियां ब्रिटिश संसद द्वारा प्रत्यायोजित की गई थीं जो अब तक अपने हस्तक्षेप करने के अधिकार का प्रयोग करती है जैसा कि अंतिम ऋण पत्र के मामले में देखा गया। ईस्ट इंडिया कंपनी को संसद द्वारा ब्रिटिश राष्ट्र के साधारण ट्रस्टी के रूप में घोषित किया गया। इसके अनुसार उसने समय-समय पर अपने ट्रस्ट की शर्तें बदली और अंततः सभी दृष्टियों से न्यासियों को अपने अधिकार प्रयोग से मुक्त कर दिया। विषय का गंभीरता से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत सरकार एक देश की सरकार नहीं थी बल्कि सामान्यतः ब्रिटिश सरकार का एक विभाग रही है। ब्रिटिश मंत्रालय ने नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष के माध्यम से कार्य करते हुए मूल प्रेरक शक्ति निर्धारित की जिससे अनुवर्ती भारतीय प्रशासन की नीति निर्धारित करने पर निर्णय लिया गया तथा ईस्ट इंडिया कंपनी आम तौर पर एक सुविधाजनक पर्दा बना गई। यदि तथ्य ऐसे होते और जिनका खंडन नहीं किया जा सकता तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सरकार के कार्य आद्योपांत ब्रिटिश राष्ट्र के कार्य कर रहे हैं। भारत का न तो कोई संविधान था और न ही कोई राष्ट्रीय सरकार थी। उस पर तो केवल विजित देश के रूप में राज्य किया गया है, यह विचार ब्रिटिश संसद तथा ब्रिटिश प्रशासन के हैं। भारतीय ऋण को इस देश की सरकार द्वारा खर्च किया गया तो फिर हम किस प्रकार अपने को भारतीय दायित्वों से स्वतंत्र मान सकते हैं?’’
श्री विनगेट ने इंग्लैंड को हुए लाभ तथा भारत को हुई हानि का जिक्र करते हुए ब्रिटिश जनता से अपना मानवीय पक्ष उजागर करने की अपील कीः
‘‘इन लाभों पर विचार करते हुए एक महत्त्वपूर्ण तथ्य जो कि सदैव पाठक