42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के मन में निरंतर उपस्थित रहना चाहिए, वह यह है कि वे लाभ चाहे वे छोटे हैं अथवा बड़े इस देश को कुछ प्राप्त नहीं हुआ है। यह इस पीढ़ी के अंग्रेजों के लिए चौंकाने वाला दावा हो सकता है, जिसे कनाडा की बगावत, कैफरे युद्ध, लंका के राजद्रोह तथा वैस्ट इंडियन गुलामों की दास्य मुक्ति के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी है और जिन्हें अपनी कालोनियों तथा अधीनस्थ क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए संसद के समक्ष वित्तीय प्रस्ताव प्रस्तुत कर प्रति वर्ष भारी धन खर्च करना पड़ता है। यह दावा किसी भी रूप में सही नहीं है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि हमने उपनिवेशों पर इतना अधिक धन खर्च किया है तथा कृतघ्न विदेशियों के लिए किए गए युद्धों पर व्यय किया है, लेकिन हमने अपने महान भारतीय साम्राज्य के अधिग्रहण अथवा सुधार पर इतना कुछ नहीं किया। यह विस्मयकारी ही नहीं बल्कि आश्चर्यजनक तथ्य है। एक पैसा खर्च किए बिना भारत पर कब्जा कर लिया गया और यह भी सत्य है कि भारत पर एक पैसा भी कम नहीं किया गया लेकिन भारत ने नियमित रूप से ग्रेट ब्रिटेन को भारी मात्रा में धन का भुगतान किया है जो कि वर्तमान सदी की मुद्रा में एक सौ करोड़ पौंउ से भी अधिक होंगे। भारतीय कर को चाहे न्याय के तराजू में तोला जाए अथवा अपने सच्ची आस्था के प्रकाश से देखा जाए तो भी मानवता से सामान्यतः भिन्न ही पाया जाएगा तथा अर्थशास्त्र के सूत्रों के भी अनुरूप।’’ भारत की शिकायतों का उल्लेख करते हुए विनगेट ने अंग्रेजों से जानना चाहाµ
‘‘क्या भारत में हमारी नीति उस देश के लोगों के कल्याण हेतु विशुद्ध निस्वार्थ एवं परोपकार के लिए निर्धारित थी तथा हमने अपनी पद्धति को प्रभावित किए बिना न्यूनतम आदर भी न दिया हो? क्या यह वही सिद्धांत था जिसने हमारे देश में आयातित भारतीय उत्पादों पर प्रतिरोधात्मक कर थोपे तथा भारत में आयात की गई ब्रिटिश वस्तुओं पर नाम मात्र के कर लगाए गए? क्या यह भारत के प्रति आदर सूचक है कि भारत से ग्रेट ब्रिटेन को निर्यात की गई कपास पर कोई शुल्क नहीं लगाया है जबकि विश्व के अन्य भागों में निर्यात की जाने वाली कपास पर कर लगाया गया? क्या यह भारत के हित के बात थी कि ब्रिटिश जहाजों द्वारा भारत में लाया गया शुल्क अन्य देश को जहाज द्वारा भेजे गए उसी माल पर लगाए गए शुल्क से दुगुना था? क्या अपराधी मामलों के साधारण न्यायालयों के न्यायाधीश से भारत में यूरोप-निवासियों को छूट प्रदान करने में भारत का कोई हित जुड़ा था, जिससे ब्रिटिश अपराधियों को देश के न्याय की तराजू में तोलना असंभव हो गया था और 99 प्रतिशत ब्रिटिश अपराधियों को दंड नहीं दिया जा सकता था? क्या हिंदू व मुसलमान करदाताओं के लिए विचार से बाहर की बात थी कि भारत में कार्य कर