ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध - Page 58

ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 43

रहे यूरोपियन को उसकी शिक्षा आदि के लिए कुछ किए बिना उसे बहुमूल्य धार्मिक स्थापना दी गई? क्या यह देशवासियों के निस्वार्थ आदर की भावना थी जिससे अन्य ब्रिटिश अधिकार वाले क्षेत्रों में लागू नियमों के विरुद्ध ब्रिटिश राजकोष से उनकी सैनिक सुरक्षा का खर्च वहन करने के लिए भारत में भारी कर लगा कर धन एकत्र किया गया और ब्रिटिश आधिपत्य वाले राजक्षेत्रों का विकास और विस्तार करने की नीति को अधिप्रेरित किया? और अंत में शुल्क चुकाने की व्यवस्था आती है, जिसे गृह कर कहा जाता है। ‘‘भारतीय राजस्व जिसके अंतर्गत भारत में लगभग 10 करोड़ पौंड स्टर्लिंग कर के रूप में एकत्रित किए गए उसे वर्तमान सदी में ग्रेट ब्रिटेन को स्थानांतरित कर दिया गया जो केवल भारतीय लोगों के लाभ के उद्देश्य से ही एकत्र किए गए। निष्पक्ष पाठकों को इन प्रश्नों के विचारपूर्वक तथा विवेकपूर्वक उत्तर देने चाहिए और फिर वे यह बताएं कि क्या भारतीय नीति के निर्धारण में ब्रिटिश तथा भारतीय हितों का कोई हिस्सा है अथवा नहीं है?’’

सभी प्रकार के विधिक व मानवीय तर्क असफल हो गये। ब्रिटिश संसद ने भारतीय ऋण में अपनी भागीदारी से स्पष्ट इंकार कर दिया, जिससे साम्राज्य का अधिग्रहण किया गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी का संपूर्ण ऋण जो 9,473,484 पौंड था और अधिकांश अनुत्पादक था उन गरीब देशवासियों के कंधों पर डाला गया जिनका कंपनी के क्रियाकलापों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं था। इतना ही नहीं, इस दुर्भाग्यपूर्ण गदर से 40,000,000 पौंड का भार भी पड़ा जोकि साम्राज्य के अधि ग्रहण के लिए वैध खर्च था। गदर की यह कीमत उचित रूप से इंग्लैंड को ही देनी चाहिए थी। जान ब्राइट ने जो अक्सर भारतीय कर दाताओं के पक्ष की हिमायतें करते थे संसद में यह कहते हुए अपील की कि ‘‘4 करोड़ पौंड क्रांति की कीमत भारत के लोगों पर गंभीर भार है। यह इंग्लैंड की संसद तथा यहां के लोगों के कुप्रबंध के कारण है। यदि प्रत्येक व्यक्ति न्यायोचित रूप से भागीदार बनता तो निस्संदेह ही 4 करोड़ का भुगतान इंग्लैंड के लोगों पर कर लगा कर उनसे वसूल कर लिया जाता।’’

इन अनुचित व्यवस्थाओं का व्यावहारिक निचोड़ यह है कि भारतीय लोगों ने ऋण के रूप में करोड़ों पौंड खर्च किए हैं, यह साम्राज्य खरीदा और एक अंश था जिसे ब्रिटिश सम्राट को भेंट किया। दूसरे शब्दों में यह तो साम्राज्य था या फिर उपहार था अथवा न्यास था। ईस्ट इंडिया कंपनी के स्टाक की व्यवस्था भी बहुत अधिक दबाव और दोषपूर्ण स्थिति में थी। कंपनी के स्टाक को ऋण लेकर चुकाया गया जिस पर पहले ही भारी ऋण लिया हुआ था तथा जिसे भारत सरकार ऋण के रूप में जाना जाता है।

इस अधिनियम से वास्तव में नियंत्रण बोर्ड को समाप्त करना था। यद्यपि कंपनी वैधानिक रूप से समाप्त हो गई फिर भी यह सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए