44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विद्यमान है और आज भी भारतीय राजस्व में से ब्याज के भुगतान के रूप में लाभांश, प्राप्त कर रही है। इस नीति का आश्चर्यजनक परिणाम इंग्लैंड को लाभ व भारत को कीमत चुकाना था। जब ब्रिटिश संसद में भारत को न्याय देने के सभी प्रयास असफल हो गए तो लार्ड डर्बी ने प्रस्ताव किया कि भारत के इस भारी ऋण की संसद को गारंटी लेनी चाहिए ताकि इसकी गारंटी पर ब्याज की दर कम की जा सके तथा भारतीय करदाताओं को राहत मिले। उन्होंने कहाः
‘‘मुझे ज्ञात है कि इस देश की संसद तथा सरकार की संयुक्त नीति का उद्देश्य भारत के ऋण के संबंध में सभी जिम्मेदारियों को नकारना है जिसे भारतीय राजकोष पर केवल प्रभार के रूप में माना गया है। वर्तमान परिस्थितियों पर विचार करते हुए मैं यही कह सकता हूं कि मैं उस नीति में किसी परिवर्तन की सिफारिश नहीं कर रहा हूं। मैं इस चेतावनी को समझता हूं जिससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकी है और मैं इसके दुष्परिणामों को भी भली-भांति जानता हूं लेकिन यह ऐसा प्रश्न है जो बार-बार उठेगा तथा जिस पर वर्तमान में तथा भविष्य में भी विचार किया जाएगा।
इसी तरह मैं सदन में यह पूछना चाहता हूं कि क्या कभी ऐसा समय आएगा जब इस संबंध में स्थापित नीति का परिवर्तन होगा तथा जब उन देयताओं के लिए राष्ट्रीय गारंटी दी जाएगी, इस गारंटी से भारतीय ऋण पर दिये गये ब्याज को 750,000 पौंड अथवा 1,000,000 पौंड कम कर दिया जाएगा जो निक्षेप निधि के रूप में बन गई है जिसे चुकता करना कठिन हो जाएगा।’’
जॉन ब्राइट ने अपनी अदूरदर्शिता से इसका विरोध करते हुए कहाµ
‘‘इस आधार पर मैं साम्राज्यिक गारंटी का विरोध करता हूं यदि हम भारत के संसाधनों को समाप्त कर भारत की सेवाएं छोड़ दें उनके हाथ अंग्रेजों की जेबों में डलवा दें, इंग्लैंड के लोगों का भारतीय खर्च पर नियंत्रण न होने पर यह कहना असंभव होगा कि वे कितना अधिक फिजूलखर्ची करने लगेंगे तथा हम भारत को बचाने के प्रयास में क्या इंग्लैंड को नष्ट नहीं करने लगेंगे?’’
इस खतरे को इतना अधिक उजागर करने हेतु श्री ब्राइट ने बहुत प्रयास किया लेकिन वह ‘‘यह समझने में असफल रहे। यदि भारतीय ऋण के दायित्व के भार की कुछ भागीदारी उन पर लाद दी जाए तो इंग्लैंड के लोग जल्दी ही भारतीय मामलों की अवहेलना करनी समाप्त कर देंगे, और भारतीय खर्च पर अपना नियंत्रण करेंगे।’’
इस चर्चा का कुछ हल नहीं निकला और देशवासियों को अनगिनत कष्टों और दुखों से कोई राहत भी नहीं मिली।
अब हमें यह देखना है कि अधिनियम का भविष्य में क्या प्रभाव पड़ेगा। इसकी