ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 45
धारा 55 के अनुसार ‘‘महारानी के आधिपत्य वाले भारतीय क्षेत्रों पर वास्तविक आक्रमण को रोकने अथवा अन्य अनिवार्य आवश्यकताओं के अतिरिक्त संसद के दोनों सदनों की सहमति के बिना सैनिक कार्यवाही के लिए धन नहीं लिया जाएगा। केवल महारानी की सेना तथा बाहरी सीमाओं पर खर्च के लिए ही राजस्व से धन लिया जाएगा।’’
श्री आर.सी. दत्त बहुत बड़े विद्वान हैं और आदरणीय हैं लेकिन उनकी यह बात समझ से बाहर है कि उन्होंने किस आधार पर इस धारा को एक प्रशंसनीय वित्तीय प्रावधान बताया है। इस बात में कोई शक नहीं कि ईस्ट इंडिया कंपनी के वित्तीय प्रशासन में सुधार हुआ है। लेकिन इस रूप में प्रशंसनीय नहीं है कि अधिनियम के बाद भी भारत का राजस्व भारत के गैर भारतीय मामलों पर खर्च किया गया है। इसमें भयावह खामियां हैं कि उपरोक्त धारा के अतिरिक्त खंड जिसमें भारत के राजस्व से भारत के बाहर खर्च करने की स्वीकृति प्रदान करता है, जिसमें से पूर्ववर्ती शब्द का लोप कर दिया गया है। इस खंड को हितकारी बनाने के लिए इस प्रकार पढ़ा जाना चाहिए था, ‘‘भारत के राजस्व आदि संसद के दोनों सदनों की पूर्व सहमति के बिना नहीं होगा।’’ और इस प्रकार नहीं जैसा कि यह अब है। एक अज्ञात लेखक का कहना है ‘‘हर संभावना में अनिवार्य प्रावधान मूल मसौदे में निहित था लेकिन बाद में ऐसे ही धूर्तता से इसे निकाल दिया गया जिसके कारण भारत सचिव की उन्मुक्ति, गैर जिम्मेदारी तथा व्यक्तिगत निरंकुशता सुरक्षित करने के लिए धारा 26, 27, 28 बनाई गई।
यह दिखाने के बाद कि लार्ड स्टैनले तथा अर्ल ऑफ डर्बी जिनका इस विधि के निर्माण में बहुत अधिक योगदान था इन उपेक्षित प्रावधानों को शामिल करने में एक थे। लेखक धारा 55 के संबंध में श्री ग्लैडस्टोन का मत इस प्रकार व्यक्त करते हैंµ
‘‘मेरे विचार में इस खंड का उद्देश्य कुछ विशेष मामलों को छोड़कर भारतीय सीमा के बाहर भारत पर किये गये सेनाओं के संचालनों के उद्देश्यों से भारतीय धन को खर्च करने की संसद की पूर्व सहमति चाहिए थी जिसे सावधानी से परिभाषित किया गया था। वास्तव में इससे सैनिक संचालनों के लिए भारतीय धन के प्रयोग को रोकना था। मुझे यह याद है कि क्योंकि मैं इस धारा का लेखक था तथा वर्तमान लार्ड डर्बी जो उस समय भारत के लिए भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) थे इस
खंड के उद्देश्यों के बारे में मुझ से सहमत थे।’’
वही लेखक फिर कहता हैµ
‘‘कुछ ऐसे कारण हैं जिससे अधिनियम के इन उपेक्षित एवं तिरस्कृत प्रावधानों के अधीन प्रत्यक्ष रूप से निर्दिष्ट सुरक्षात्मक उपायों की घोर अवहेलना की तुलना