54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विकेन्द्रीकरण आरंभ हो गया हो। लेकिन तिथि की सही-सही जानकारी हासिल करना घास के ढेर में से सुई खोज निकालने के समान होगा और यह संदेहजनक है कि उस प्रयास का परिणाम की गई मेहनत के अनुरूप होगा। इसके अतिरिक्त, यद्यपि मुझे स्वयं अपने द्वारा बताई तिथि के बारे में पूरा विश्वास नहीं है लेकिन मैं महसूस करता हूं कि बाद के अनुसंधानकर्ता मेरे वक्तव्य की पुष्टि ही करेंगे। एक अन्य विषय जिसकी चर्चा मैं नहीं कर पाया, लेकिन जिसकी चर्चा मैं करना चाहता हूं, वह प्रांतीय और स्थानीय वित्त का अंतःसंबंध है। मूलतः मेरी योजना इसकी चर्चा करने की थी, लेकिन मैंने इसे छोड़ दिया। क्योंकि मैंने पाया कि मेरा विषय ‘साम्राज्यवादी वित्त का प्रांतीय विकेन्द्रीकरण’ उन तथ्यों और तर्कों से आच्छादित होने लगा जो विषय के अनुरूप नहीं थे। हालांकि ये कमियां मेरे पूरक गं्रथ ‘ब्रिटिश भारत में स्थानीय वित्त’ से दूर हो जाएंगी जिस पर मैं कार्य कर रहा हूं और मुझे उम्मीद है कि यह ग्रंथ शीघ्र ही प्रकाशित हो जाएगा। तथ्यों की पुनरावृत्ति इस ग्रंथ की कमियां हो सकती हैं लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना उचित होगा। लेकिन जब शुद्ध संचय में बरती गई कंजूसी विषय को अस्पष्ट बना सकती है वहां पुनरावृत्ति अनिवार्य और न्यायसंगत हो जाती है क्योंकि विषय का स्पष्टीकरण अनिवार्य होना चाहिए।
इस भूमिका को मैं भारत कार्यालय में कार्यरत वित्त सचिव श्री रॉबिन्सन को धन्यवाद दिए बिना पूर्ण नहीं कर सकता। श्री रॉबिन्सन द्वारा दिए गए अनेक सुझाव और विषय से संबंधित महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों के लिए मैं उनका आभारी हूं। साथ ही मैं लंदन विश्वविद्यालय के प्रो. कैनन का भी आभारी हूं, जिन्होंने पांडुलिपि के एक भाग का कच्चा प्रारूप पढ़ा। कोलम्बिया विश्वविद्यालय में मेरे शिक्षक प्रो. सेलिगमैन का मैं अत्यधिक आभारी हूं क्योंकि लोक वित्त के सिद्धांत का पहला पाठ मैंने उन्हीं से पढ़ा। प्रूफ पढ़ने के जबाऊ कार्य में मेरी मदद करने के लिए मैं अपने मित्र श्री सी.एस.देओले का आभारी हूं।
µभीमराव अम्बेडकर