परिचय - Page 72

परिचय

विषय की परिभाषा और रूपरेखा

भारतीय वित्त के अध्येता की जानकारी और मार्गदर्शन के केवल दो प्रमुख स्रोत हैं। पहला स्रोत वार्षिक बजट वक्तव्य है और दूसरा वित्त तथा राजस्व लेखा का वार्षिक अंक (ग्रंथ) है। हालांकि दोनों अलग-अलग जारी किए जाते हैं लेकिन वास्तव में वित्तीय वक्तव्य के संदर्भ में दोनों एक दूसरे के सहयोगी अंक हैं अर्थात् वार्षिक वित्तीय लेन-देन का विस्तृत व्याख्यात्मक ज्ञापन जिसका विवरण वित्त तथा राजस्व लेखा के अंक में उल्लिखित होता है।

ये स्रोत सहायक तो हैं लेकिन साथ ही क्लिष्ट भी हैं। वित्त तथा राजस्व लेखा के नवीन अंक से पता चलता है कि उसमें लेखा-जोखा चार विभिन्न वर्गों में बांटा गया हैः (1) साम्राज्यवादी अथवा केन्द्रीय, (2) प्रांतीय, (3) समाविष्ट स्थानीय तथा (4) अपवर्जित स्थानीय। लेकिन किसी भी तरह से यह वर्गीकरण समरूपेण नहीं है। उदाहरणस्वरूप 1870 ई. से पहले के इस गं्रथमाला के किसी अंक में लेखा के लिए ‘‘प्रांतीय’’ शब्द नहीं मिलेगा और न ही 1863 के पूर्व के अंकों में ‘‘स्थानीय’’ नाम से लेखा-जोखा का विवरण मिलेगा। इसी तरह 1870 के पहले के वित्तीय वक्तव्य के अंक में वित्तीय लेन-देन को केवल ‘‘केन्द्रीय’’ तथा ‘‘स्थानीय’’ वर्गों में विभाजित किया गया है। लेकिन 1908 के बाद के इस ग्रंथमाला के एक अंक में लेखा-जोखा

  1. यह आश्चर्यजनक है कि ‘‘अपवर्जित स्थानीय’’ वर्ग से पुकारे जाने वाले खाते का जिक्र वित्त तथा

राजस्व लेखा के अंक (खंड) में तो है लेकिन वित्तीय वक्तव्य में नहीं है। लेखक उसके न रखे जाने

का कारण नहीं ढूंढ पाया है। मद्रास मैनुअल (अंक 1, अध्याय पांच, पृ. 467-9) में कहा गया है कि

अपवर्जन का कारण तकनीकी है। चूंकि अपवर्जित निधियां केन्द्रीय सरकार की राजस्व एकत्रित करने

वाली सामान्य एजेंसी द्वारा एकत्रित नहीं की जातीं और केन्द्र सरकार के हस्तक्षेप के अधिकार से बाहर

हैं। एक अन्य तकनीकी कारण अपवर्जित सिविल एकाउंट कोड के तीसरे अंक (पृ. 137) में दिया गया

है जिसके अनुसार निधियों को अपवर्जित कहा गया है अर्थात् वित्तीय वक्तव्य से क्योंकि उन्हें सरकारी

कोष में जमा करना जरूरी नहीं था। लेकिन उसी के सातवें तथा नए अंक (पृ. 122) में उसी विषय

पर दी गई टिप्पणी का यह अर्थ है कि जनता के लिए सभी निधियों को सरकारी खजाने में जमा करना

आवश्यक है। 1882-83 के लिए जारी ‘‘मौरल एंड मेटिरियल प्रोग्रेस रिपोर्ट’’ (भाग 1, पृ. 107) में दी

गई दलील कुछ हद तक सही लगती है। इसमें कहा गया है कि सामान्य वित्त व्यवस्था में इन निधियों

के लिए कोई स्थान नहीं है क्योंकि ये मुख्यतः ‘‘विशेष न्यासों और धर्मदायों के लिए हैं।’’