परिचय - Page 73

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को ‘‘केन्द्रीय’’ तथा ‘‘स्थानीय’’ वर्गों के तहत नहीं बल्कि (1) केन्द्रीय (2) प्रांतीय वर्गों के अंतर्गत रखा गया है जबकि 1921 के बाद के वित्तीय वक्तव्य केवल केन्द्रीय लेन-देन का ही जायजा लेते हैं। नौसिखिया के लिए लेख की नई श्रेणियों के आगमन और पुरानी श्रेणियों के निर्गमन से अधिक भ्रामक और कुछ नहीं है। ख्1, वह यह स्वाभाविक प्रश्न कर सकता है कि ये विभिन्न वर्ग कैसे उत्पन्न हुए और इनका एक दूसरे से क्या संबंध है?

वर्तमान अध्ययन में इनमें से एक श्रेणी ‘‘प्रांतीय’’ की उत्पत्ति और विकास को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया है। लेकिन प्रस्तुत तर्कों को स्पष्ट करने में कोई कठिनाई न हो इसलिए यह उचित समझा गया कि इस अध्ययन के पहले भूमिका के रूप में एक खाका खींचा जाए जो विषय-वस्तु को परिभाषित करने के साथ-साथ विभाजित किए गए हिस्सों के अंतःसंबंधों की भी जानकारी दे। विषय की गहन जानकारी के लिए इस अध्ययन को चार भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक भाग प्रांतीय वित्त व्यवस्था की व्युत्पत्ति विकास, संगठन तथा 1919 के संवैधानिक परिवर्तनों द्वारा इसको दिए गए अंतिम रूप की चर्चा करता है। प्रांतीय वित्त व्यवस्था की व्युत्पत्ति के बारे में पूरी जानकारी देने की दृष्टि से पहले भाग में कुछ कठिन, अछूते, लेकिन जरूरी पहलुओं को उठाया गया है। जहां ‘‘वर्तमान को जानने के लिए अध्येता को अतीत की जानकारी आवश्यक है’’ उक्ति को पूरा सम्मान दिया गया है वहीं वर्तमान के अतीत से अधिक की चर्चा नहीं की गई है। पहले अध्याय के प्रथम भाग में प्रांतीय वित्त व्यवस्था के शुरू होने से पहले विद्यमान वित्त व्यवस्था की तस्वीर खींचने की कोशिश की गई है और इसके संगठन में बदलाव लाने वाले कारणों की भी चर्चा की गई है। दूसरे अध्याय में पुनर्रचना के काल के दौरान प्रस्तुत की गई वैकल्पिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है, और यह भी दर्शाया गया है कि इसे सामान्य मान्यता क्यों नहीं मिल पाई। तीसरे अध्याय में उस योजना की चर्चा की गई है जिससे वर्तमान व्यवस्था और इसकी विरोधी व्यवस्था के बीच समझौता नहीं हुआ और उन परिस्थितियों की भी चर्चा की गई है जिनसे इसको सम्मान मिला।

प्रथम भाग में प्रांतीय वित्त व्यवस्था की व्युत्पत्ति का वर्णन करने के बाद इसको विकास के दूसरे भाग का विषय बनाया गया है। प्रथम भाग का विन्यास कितना सहायक है, तुलनात्मक अध्ययन के अभाव में, इसे पाठक पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। हालांकि दूसरे भाग के संबंध में यह उललेखनीय है कि इसमें किया गया विन्यास प्रांतीय वित्त के विषय पर स्वर्गीय जस्टिस रानाडे द्वारा लिखित और 1887 ई. में प्रकाशित आंशिक खाके से अलग है। दूसरे भाग पर नजर डालने से स्पष्ट है कि प्रांतीय वित्त की एक विशेषता यह थी कि प्रांतीय बजटों में शामिल राजस्व और खर्चे पांच वर्ष के पश्चात् संशोधित किए जाते