परिचय - Page 74

परिचयः विषय की परिभाषा और रूपरेखा

59

थे। अपने प्रालेख में, जो इस अध्ययन के दूसरे भाग में उल्लिखित वर्णन का ही उल्लेख करता है और वह भी 1882 ई. तक ही, जस्टिस रानाडे ने इसी विशेषता को आधार बनाकर प्रांतीय वित्त के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को एक-दूसरे से अलग दिखाया है। परिणामस्वरूप उनके लिए प्रत्येक पांच वर्ष की अवधि एक चरण बन जाती है। और उनके हाथों प्रांतीय वित्त का इतिहास उतने ही चरणों में विभाजित हो जाता है, जितने पांच वर्ष के हिस्से बनते हैं। फिर भी, यह कहा जा सकता है कि यदि प्रत्येक संशोधन से प्रांतीय वित्त के मूलभूत सिद्धांतों को बदला गया है तो इस तरह का विन्यास असंगत नहीं होगा। लेकिन सच यह है कि प्रत्येक संशोधन के बाद प्रांतीय वित्त के महत्व में कोई अंतर नहीं आया। संशोध नों में थोड़ा बहुत परिवर्तन किया गया। यदि प्रांतीय वित्त के विकास के इतिहास को उसके मूलभूत आधार में आए परिवर्तन के अनुसार चरणों में विभाजित किया जाए तो इसकी उन विशेषताओं पर जोर डालना होगा जिनका स्वरूप नितांत भिन्न है। लोकहित के सिद्धांत के लेखक इस विषय को ऐसा समझते हैं मानों यह मुख्य रूप से कराधान में साम्यता और व्यय में मितव्ययता का विषय है। लेकिन वित्त मंत्री के लिए वित्त मुख्य रूप से बजट में संतुलन पाने की समस्या का व्यावहारिक रूप से समाधान करना है। यदि हम प्रांतीय बजटों में संतुलन की समस्या का समाधान करने और समय-समय पर उसमें किए गए परिवर्तनों को जानने की नीयत से ब्रिटिश इंडिया में प्रांतीय वित्त के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो हम पाएंगे कि प्रांतीय वित्त तीन विशिष्ट चरणों से होता हुआ विकसित हुआ है। इन तीनों ही चरणों की पूर्ति के अपने ही तरीके रहे हैं। ये विशिष्ट चरण हैंµ निर्देशन, निर्दिष्ट राजस्व तथा सांझा राजस्व, परिणामस्वरूप, जस्टिस रानाडे की यांत्रिक योजना का अनुसरण करने की अपेक्षा यह ज्यादा तर्कसंगत और ज्ञानवर्धक माना गया कि प्रांतीय वित्त के विकास के चरणों को भारत सरकार द्वारा अपनाए गए प्रांतीय सरकारों को पूर्ति के तरीके की तरह विभाजित किया जाए। फलस्वरूप, दूसरे भाग को जिसमें प्रांतीय वित्त के विकास की चर्चा की गई तीन अध्यायों में बांटा गया हैः 1. निर्देशन द्वारा बजट 2. निर्दिष्ट राजस्व द्वारा बजट और 3. सांझे राजस्व द्वारा बजट।

प्रांतीय वित्त की व्युत्पत्ति और विकास संबंधी इस बहस के बाद तीसरे भाग में इसके संगठन की जांच की गई है। तीसरे भाग के सातवें अध्याय में प्रांतीय सरकारों की वित्तीय शक्तियों पर अंकुश लगाने वाले अब तक उपेक्षित रहे नियमों का विश्लेषण किया गया है, ताकि इस सत्य को उद्घाटित किया जा सके कि अपने संगठन में प्रांतीय वित्त स्वतंत्र नहीं था। हालांकि प्रांतीय वित्त की वास्तविक स्थिति का विश्लेषण आठवें अध्याय के लिए आरक्षित कर लिया गया है, जिसमें इन सीमाओं के पहलुओं