परिचय - Page 75

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पर उल्लेख द्वारा यह बल दिया गया है कि प्रांतीय वित्त के महान अभियान के बावजूद केन्द्रीय राजस्व और केन्द्रीय सेवाओं से हटकर न तो प्रांतीय राजस्व हैं और न ही प्रांतीय सेवाएं। लिहाजा व्यवस्था संघीय होने के बजाए साम्राज्यवादी ही रही। नवें अध्याय में पुराने कानून के तहत भारत सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारियों को हानि पहुंचाए बिना प्रांतीय वित्त के कार्य का विस्तार करने की संभावनाओं का पता लगाने के बारे में विचार किया गया है।

चौथे भाग में 1919 के सुधार कानून द्वारा प्रांतीय वित्त की संरचना में लाए गए बदलाव के बारे में चर्चा की गई है। इस भाग के दसवें अध्याय में इन परिवर्तनों के कारणों का विश्लेषण किया गया है। ग्यारहवें अध्याय में नए कानून द्वारा लाए गए परिवर्तनों को ब्यौरा दिया गया है। जबकि बारहवें अध्याय में नई व्यवस्था की समीक्षा की गई है।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि भारतीय वित्त के अध्येता प्रांतीय वित्त का अर्थ सामान्यतः ‘‘वित्त का विकेन्द्रीकरण’’ समझ बैठते हैं, इस अध्याय के क्लिष्ट शीर्षक को न्यायोचित ठहराने के लिए दो शब्द कहने होंगे। भारतीय वित्त का कोई भी विद्यार्थी, जो व्यवस्था के विभिन्न आयामों में विभाजित होने से बखूबी परिचित है, प्रांतीय वित्त के लिए ‘‘वित्त के विकेन्द्रीकरण’’ की उक्ति की अनुपयुक्तता को समझने में गलती नहीं करेगा। यदि भारतीय व्यवस्था में केवल प्रांतीय विकेन्द्रीकरण ही होता तो नए शीर्षक के लिए परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं होती। वास्तव में विकेन्द्रीकरण के आरंभिक तत्व किसी तरह भी एक समान नहीं हैं और इनके द्वारा विकसित प्रणाली के स्वरूप भिन्न हैं। उदाहरण के लिए, विकेन्द्रीकरण का केन्द्र और 1855 ई. में लागू की गई विकेन्द्रीकरण की नीति से विकसित प्रणाली 1870 ई. में की गई विकेन्द्रीकरण की नीति द्वारा विकसित प्रणाली और केन्द्र से भिन्न थीं। साथ ही यह ध्यान देने योग्य है कि 1892 से धीरे-धीरे विकेन्द्रीकरण किया जा रहा केन्द्र 1855 ई. अथवा 1870 ई. में किए गए विकेन्द्रीकरण से प्रभावित केन्द्रों से भिन्न है। इसे अधिक स्पष्ट रूप में कहें तो 1855 ई. का विकेन्द्रीकरण भारतीय वित्त का विकेन्द्रीकरण था जिसके फलस्वरूपµ

(1) स्थानीय वित्त व्यवस्था को साम्राज्यिक (केन्द्रीय) वित्त व्यवस्था से अलग

करना।

1870 ई. का विकेन्द्रीकरण साम्राज्यवादी वित्त व्यवस्था का विकेन्द्रीकरण था जिसके फलस्वरूपःµ

(2) प्रांतीय वित्त व्यवस्था को साम्राज्यिक (केन्द्रीय) वित्त व्यवस्था से अलग