1 साम्राज्यवादी व्यवस्था : इसका विकास और ह्रास - Page 83

68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के तहत यूरोप में जन्मे ब्रिटिश नागरिकों के देश में अबाध प्रवेश से उत्पन्न हुए थे। इसने महसूस किया कि अप्रवासियों के प्रति सौहार्दपूर्ण बर्ताव तथा उन पर प्रभावी नियंत्रण अत्यंत आवश्यक था। संसद को भय था कि समान एवं स्वतंत्र वैधानिक और प्रशासनिक शक्तियों से लैस विभिन्न सरकारें भिन्न विचारों तथा अप्रासंगिक सिद्धांतों के चलते अपनी-अपनी सीमाओं में प्रवेश करने वाले अप्रवासियों के प्रति इनका इस्तेमाल कर उन्हें एक ऐसे असंतुष्ट समुदाय में शामिल कर देंगी जिससे उनसे निपटना मुश्किल हो जाएगा। सार्वभौम सिद्धांतों पर आधारित सौहार्दपूर्ण व्यवहार की आवश्यकता के अतिरिक्त संसद का यह भय भी पूरी तरह से दूर नहीं हो पाया था कि ब्रिटिश अप्रवासियों का आगमन स्थानीय नागरिकों के उत्पीड़न को पुनर्जीवित कर देगा। चूंकि इसके फिर से उभर आने की पूरी संभावना मानी जा रही थी अतः संसद उन्हें एक शक्तिशाली और सार्वभौम केन्द्रीय नियंत्रण के तहत रखना चाहती थी ताकि एक अधिकार क्षेत्र में अपराध करने वाला दूसरे अधिकार क्षेत्र में शरण प्राप्त न कर सके। अतः चाहे कानूनों की एकरूपता लाने के दृष्टिकोण से देखा जाए या फिर व्यवस्था को हानि पहुंचाने वाले तत्वों पर कड़ा नियंत्रण करने की इच्छा के दृष्टिकोण से अपने विभाजित अधिकार क्षेत्र के कारण तात्कालिक शासन व्यवस्था सोचे हुए उद्देश्य की पूर्ति के लिए सक्षम नहीं थी। आपातकाल के लिए भारत के मामलों पर नियंत्रण करने और कानून बनाने के लिए एक सर्वशक्तिसम्पन्न केन्द्र सरकार को ही उचित हल माना गया। तदनुसार 1833 में कानून बनाया गया किµ

‘‘गवर्नर जनरल इन काउंसिल (बंगाल में फोर्ट विलियम में अवस्थित) को कथित सीमा क्षेत्रों या उनके किसी हिस्से में लागू, इसके बाद लागू होने वाले कानूनों अथवा नियमों को बनाने, बदलने, संशोधन करने अथवा निरस्त करने का अधिकार होगा। साथ ही उन सभी लोगों चाहे वे ब्रिटिश नागरिक हों अथवा भारतीय, चाहे विदेशी हों अथवा अन्य सभी अदालतों, चाहे सम्राट के चार्टर द्वारा स्थापित हों अथवा अन्यथा उनके अधिकार क्षेत्रों के लिए और उक्त राज्य क्षेत्र सभी स्थानों एवं सीमा क्षेत्र के लिए और राजाओं की रियासतों में कंपनी तथा राज्यों तथा राज्यों के साथ गठबंधन करने वाली कंपनी में कार्य करने वाले सभी कर्मचारियों के लिए कानून तथा नियम बनाने का अधिकार होगा।’’ ख्1,

इस प्रकार भारत के गवर्नर जनरल इन काउंसिल को विशिष्ट वैधानिक शक्तियां प्रदान कर एक साम्राज्यिक (इम्पीरियल) सरकार का गठन किया गया। लेकिन आज की तरह यदि उस समय भी मद्रास व बंबई जैसी दो प्रेसीडेंसियों को अपनी-अपनी सीमा क्षेत्रों में कानूनी तौर से नागरिक एवं सैन्य सरकार बनाने का अधिकार होता तो केन्द्र सर्व-शक्तिमान नहीं बन पाता। दूसरी ओर यदि संसद

  1. 3 और 4 विलि. की धारा 43, सी. 85, ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ प्रभावी समझौता और भारतीय

सीमा क्षेत्रों में ब्रिटिश साम्राज्य के बेहतर प्रशासन के लिए बनाया गया कानून।