साम्राज्यवादी व्यवस्थाः इसका विकास और ”ास 69
उनसे यह अधिकार नहीं छीनती तो इन दो प्रशासनिक शक्तियों और नव-निर्मित वैधानिक शक्ति के बीच टकराव की संभावना पैदा हो जाती। शांति, व्यवस्था और अच्छी सरकार चलाने की जिम्मेदारी के नाम पर पहली शक्ति दूसरे द्वारा बनाए गए कानूनों की रोशनी में प्रशासन चलाने से मना कर सकती थी और इस तरह एक केन्द्रीय तथा शक्तिशाली सरकार के गठन से होने वाले संभावित लाभ हासिल नहीं हो पाते। नव-निर्मित भारतीय राजतंत्र की इस कमजोरी को दूर करने के लिए संसद ने बंबई और मद्रास प्रांतों को उनकी उच्च हैसियत से वंचित करने का कदम उठाया, जो उन्हें उत्तरदायी सरकारों के रूप में प्राप्त थे, ताकि नए संविधान के अनुसारµ
‘‘ ख्..., अनेक प्रांतों के प्रत्येक की कार्यकारी सरकार का एक गवर्नर और तीन काउंसिलर्स (पार्षदों) द्वारा प्रशासन (अब तक की तरह समाहित नहीं) चलाया जाता था जबकि’’ ख्....1,
‘‘भारत के राजस्व और सभी सीमा क्षेत्रों की नागरिक तथा सैन्य सरकारों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति, एक गवर्नर जनरल तथा काउंसिलर्स (पार्षदों) में निहित थी जिसे भारत का गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल कहा जाता था।’’ ख्2,
इस तरह भारत में ‘‘साम्राज्यवादी शासन व्यवस्था’’ की नींव पड़ी। यह सच है कि इस व्यवस्था की स्थापना के बहुत पहले बंगाल सरकार ख्3, को आपातकाल को छोड़कर बाकी समय किसी भी भारतीय राजा या शक्ति के खिलाफ लड़ाई घोषित करने अथवा छेड़ने या शांति-संधि अथवा अन्य किसी तरह की संधि करने के मामले में मद्रास तथा बंबई प्रांतों की सरकारों के प्रबंधन पर निगरानी रखने तथा नियंत्रण करने का पूरा अधिकार था, तथा बाद में निर्मित कानून माध्यम से उक्त प्रदेशों की नागरिक एवं सैन्य सरकारों, सैन्य बल तथा राजस्व संग्रहण के मसलों पर भी निगरानी करने का पूरा अधिकार प्राप्त था। ख्4, लेकिन इससे यह नहीं माना जाना चाहिए, जैसा अक्सर किया जाता है कि 1833 से पूर्व दोनों प्रांत
- 3 और 4 विलि. की धारा 43, सी. 85, ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ प्रभावी समझौता और भारतीय सीमा
क्षेत्रों में ब्रिटिश साम्राज्य के बेहतर प्रशासन के लिए बनाया गया कानून।
- वही, एस. 56, धारा 57 के द्वारा प्रांतों में काउंसिलर्स (पार्षदों) की संख्या घटाने लगा उन्हें हमेशा के
लिए निलंबित करने का अधिकार दिया गया जिससे प्रदेश की कार्यकारी सरकार को केवल गवर्नर के
भरोसे छोड़ दिया गया। इस अधिकार का उपयोग 1833 में बंबई और मद्रास इक्जीक्यूटिव काउंसिलर्स
(कार्यकारी पार्षदों) की संख्या 3 से घटाकर 2 करके किया गया।
3 और 4 विलि. 4 सी. 85, एस. 39
13 जीओ III, सी. 52, एस. 40