साम्राज्यवादी व्यवस्थाः इसका विकास और ”ास 71
निर्भर रहते थे और ऐसा इसलिए नहीं करते थे कि उनके राजकोष निश्चित नहीं थे, बल्कि इसलिए कि वे ईस्ट इंडिया कंपनी के समान राजकोष के ही भाग थे। यह सब सन् 1833 के कानून द्वारा बदल दिया गया जिसके अंतर्गत अब समस्त राजस्व और विभिन्न राज्य क्षेत्रों का शासन भारत के गवर्नर जनरल की काउंसिल (परिषद्) में निहित कर दिया गया। सभी राजस्व और सेवाओं को कानून बनाकर भारत सरकार का राजस्व और सेवाएं घोषित कर दिया गया। सभी प्रांत भारत सरकार के लिए राजस्व जमा करने और खर्च करने वाली एजेंसियां बन गए। उन्हें अब अपने नाम से नए कर लगाने और पुराने कर वसूल करने का अधिकार नहीं रहा। इसी तरह उनके द्वारा प्रशासित सेवाएं भी भारत सरकार की जिम्मेदारी बन गई और सेवाओं के रख-रखाव के लिए विभिन्न प्रांतों को समेकित निधि में से धन दिया गया। ऐसी कानूनी व्यवस्था बना दी कि भारत सरकार की पूर्वानुमति के बिना प्रांतीय सरकारें कोई नया कार्यालय
खोलने, कोई वेतन, ग्रेच्युटी अथवा भत्ता देने के लिए उन्हें आबंटित धन का इस्तेमाल नहीं कर सकती। ख्1, सरकारी ऋण अब किसी एक विशेष प्रांत के राजस्व पर भार नहीं रहा और अब प्रांतोंं के बीच एक-दूसरे के राजस्व पर प्राथमिक या द्वितीय देयता का भार न रहा। अब सभी प्रांतीय ऋण भारत सरकार के ऋण हो गए और सम्पूर्ण भारत के राजस्व पर प्रभार हो गया। संक्षेप में, इस वित्त व्यस्था की जो स्रोतों और आय से जमा राशि को अलग करने वाली व्यवस्था के समान थी वित्तीय व्यवस्था को स्रोतों के समूह और आय के बंटवारे में तब्दील कर दिया गया। जैसा कि 1833 के कानून की बदौलत सरकारी संकल्प में कहा गया थाµ
‘‘ब्रिटिश भारत, यद्यपि सुविधा के लिहाज से स्थानीय रूप से नियंत्रित पृथक सरकारों के तहत प्रांतों में विभाजित था। लेकिन वास्तव में ग्रेट ब्रिटेन पर निर्भर अकेली ऐसी विशाल शक्ति बन गया था जिसके हित अविभाजित थे, जिसके पास एक ही राजकोष था और जो सभी आवश्यक तथा सामान्य सिद्धांतों में एक ही सरकार गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल द्वारा नियंत्रित था, भारत के समस्त संसाधन एक उद्देश्य पर लागू होते थे और वह था उसके क्रियाकलापों का निर्वहन तथा इंग्लैंड में इसके प्रबंधन से संबंधित क्रियाकलाप और ब्रिटिश भारत के जिस किसी भी भाग में धन की आवश्यकता पड़ती तो उन स्रोतों का उल्लेख किए बिना जहां से निधियां प्राप्त हुईं, निधियां उपलब्ध कराई जातीं।’’ ख्2,
समय के साथ साम्राज्यिक (इम्पीरियल) वित्त व्यवस्था इतनी अधिक व्यापक हो चुकी थी कि जब 1858 में सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत सरकार की बागडोर संभाली तो यह पाया गया किµ
3 और 4 विलि. IV, सी. 85, एस 59
भारत सरकार के वित्त विभाग का प्रस्ताव, दिनांक 22 नवम्बर 1843।